ऐसी भी बातें होती हैं – NCERT Solutions Class 9 Hindi Ganga includes all the questions with solution given in NCERT Class 9 हिंदी (गंगा) textbook.
NCERT Solutions Class 9
English Kaveri Hindi Ganga Sanskrit Sharada Maths Ganita Manjari Science Exploration Social Understanding Societyऐसी भी बातें होती हैं – NCERT Solutions
Q.1:
लता जी ने अपने पिताजी से क्या-क्या सीखा?
Options:
(1) अनुशासन और नियम के साथ जीना
(2) भय और संशय के साथ जीना
(3) स्वाभिमान और सच्चाई के साथ जीना ✅
(4) चतुराई और संयम के साथ जीना
Explanation:
इस साक्षात्कार में लता मंगेशकर ने स्पष्ट रूप से बताया है कि उन्होंने अपने पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर से स्वाभिमान और सही बात पर डटे रहने की सीख प्राप्त की। उन्होंने कहा कि:
- उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया
- हर परिस्थिति में आत्मसम्मान के साथ जीना सीखा
- अगर कोई बात सही लगे, तो उस पर डटे रहना चाहिए
ये बातें सीधे-सीधे स्वाभिमान और सच्चाई के साथ जीने को दर्शाती हैं।
Q.2:
पिताजी की मृत्यु के बाद परिवार सँभालने का लता जी का निर्णय किस जीवन-मूल्य का द्योतक है?
Options:
(1) संघर्ष
(2) निराशा
(3) भौतिकता
(4) कर्तव्यनिष्ठा ✅
Explanation:
- लता मंगेशकर ने बताया कि पिताजी के निधन के बाद उन्होंने पूरे परिवार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।
- उन्होंने लगातार मेहनत की, दिन-रात रिकॉर्डिंग की और यही सोचती रहीं कि परिवार की जरूरतें कैसे पूरी करें।
यह व्यवहार दिखाता है कि उन्होंने अपने कर्तव्य को सबसे पहले रखा और पूरी निष्ठा से उसे निभाया।
Q.3:
“बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है…” ‘मंगलागौर’ के वर्णन से भारतीय समाज की कौन-सी परंपरा उजागर होती है?
Options:
(1) संगीत पर आधुनिकता का प्रभाव
(2) लोकगीतों की लोकप्रियता में कमी
(3) धार्मिक कार्यक्रमों में संगीत का महत्व
(4) संगीत की महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका ✅
Explanation:
पाठ में लता मंगेशकर ने “मंगलागौर” का वर्णन करते हुए बताया है कि इस अवसर पर:
- स्त्रियाँ इकट्ठा होती हैं
- मिलकर गीत गाती हैं और नृत्य करती हैं
- पूरा उत्सव सामूहिक और सामाजिक रूप में मनाया जाता है
इससे स्पष्ट होता है कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम है। यह लोगों के बीच संबंध, खुशी और सामूहिकता को बढ़ाता है।
Q.4:
“गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन”- इस कहावत का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
Options:
(1) नाव गाँव में नहीं रहती, नदी में बहती है।
(2) इस नश्वर संसार में सब कुछ नष्ट हो जाता है।
(3) फिल्मों में गीत गाने से बहुत प्रसिद्धि मिलती है।
(4) जीवन अस्थायी है, पर कर्म अमर रहते हैं। ✅
Explanation:
लता मंगेशकर ने इस कहावत का अर्थ समझाते हुए कहा कि “गाँव तो बह जाता है, लेकिन नाम रह जाता है।”
इसका प्रतीकात्मक अर्थ है:
- मनुष्य का शरीर (जीवन) नश्वर है
- लेकिन उसके कर्म, काम और नाम हमेशा जीवित रहते हैं
यही कारण है कि महान लोगों को उनके कार्यों के कारण लंबे समय तक याद किया जाता है।
Q.5:
कोरस में साथ गाने वाली लड़कियों के साथ लता जी के संबंध कैसे थे?
Options:
(1) औपचारिक
(2) कामकाजी
(3) आत्मीय ✅
(4) प्रतिस्पर्धात्मक
Explanation:
लता मंगेशकर ने बताया कि कोरस में गाने वाली लड़कियों के साथ उनके संबंध:
- बहुत अच्छे और घरेलू जैसे थे
- उनका घर में आना-जाना होता था
- वे उनके साथ बैठकर बातें करती थीं
- उन्हें अपने परिवार जैसा मानती थीं
यह सब दर्शाता है कि उनके संबंध केवल काम तक सीमित नहीं थे, बल्कि भावनात्मक और आत्मीय थे।
Q.6:
लता मंगेशकर के अनुसार बाबा हरिदास और तानसेन की कथाओं से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
Options:
(1) संगीत द्वारा दीपक जलाए जा सकते हैं।
(2) मेघराग गाने से वर्षा होने लगती है।
(3) सुर में वाद्य बजाने से तार टूट जाते हैं।
(4) संगीत में अपरिमित शक्ति होती है। ✅
Explanation:
लता मंगेशकर ने बाबा हरिदास और तानसेन से जुड़ी कथाओं के बारे में कहा कि हो सकता है उनमें कुछ सच्चाई हो, लेकिन निश्चित रूप से यह कहना कठिन है।
फिर भी उन्होंने यह स्पष्ट माना कि:
- संगीत में असीम (अपरिमित) शक्ति होती है
- वह कुछ अप्रत्याशित प्रभाव उत्पन्न कर सकता है
उन्होंने उस्ताद अली अकबर ख़ाँ के उदाहरण से भी बताया कि गहरे सुर में डूबने पर वाद्य का तार भी टूट सकता है-जो संगीत की शक्ति को दर्शाता है।
Q.7:
पूरे साक्षात्कार में लता मंगेशकर की जो छवि बनती है, वह मुख्यतः कैसी है?
Options:
(1) सादगी, समर्पण और आत्मसम्मान की ✅
(2) प्रसिद्धि, परिवार को समर्पित और आत्ममुग्ध
(3) कठोर सिद्धांतवादी और व्यावहारिक व्यक्ति
(4) आधुनिकता विरोधी रूढ़िवादी विचारों वाली
Explanation:
पूरे साक्षात्कार में लता मंगेशकर की जो छवि उभरती है, उसमें-
- सादगी: साधारण जीवन, सरल स्वभाव और विनम्रता
- समर्पण: संगीत और परिवार के प्रति पूर्ण निष्ठा
- आत्मसम्मान: किसी के आगे हाथ न फैलाना, अपने सिद्धांतों पर टिके रहना ये तीनों गुण बार-बार उनके उत्तरों में दिखाई देते हैं।
Q.8:
“पिताजी उस समय पूछते थे, ‘समझ गए न?’… इसके बाद वे कहते थे कि ‘अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।” यह प्रसंग पारिवारिक अनुशासन और स्नेह के संतुलन का प्रतीक है। कैसे?
Solution:
यह प्रसंग पारिवारिक अनुशासन और स्नेह के सुंदर संतुलन को दर्शाता है। लता मंगेशकर बताती हैं कि उनके पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर बच्चों को डाँटते नहीं थे, बल्कि केवल गंभीर नजर से देखते थे और पूछते थे- “समझ गए न?” इससे बच्चों में गलती का एहसास स्वयं जागता था। यहाँ अनुशासन डर पर नहीं, बल्कि सम्मान पर आधारित था। बच्चों को यह महसूस होता था कि उन्होंने कुछ गलत किया है और उन्हें सुधारना चाहिए। साथ ही, “अब जाओ, बाहर खेलो” कहकर वे स्नेह भी जताते थे, जिससे बच्चों पर मानसिक दबाव नहीं बनता था। इस प्रकार, यह प्रसंग दिखाता है कि सही अनुशासन वही है जिसमें कठोरता के बजाय समझ, विश्वास और प्रेम का समावेश हो।
Q.9:
लता मंगेशकर पर अपने पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर के व्यक्तित्व का क्या प्रभाव पड़ा? उनके कौन-कौन से कार्यों और व्यवहार में उनके पिता का प्रभाव दिखाई देता है?
Solution:
लता मंगेशकर पर उनके पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर के व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने उनसे स्वाभिमान, अनुशासन और सही बात पर डटे रहने की सीख ली। यही कारण है कि लता जी ने जीवन में कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया और हर परिस्थिति में आत्मसम्मान बनाए रखा।
उनके व्यवहार में यह प्रभाव स्पष्ट दिखता है- वे अपने काम के प्रति अत्यंत समर्पित रहीं, कठिन परिस्थितियों में भी परिवार की जिम्मेदारी निभाई और लगातार मेहनत करती रहीं। उन्होंने पिताजी की तरह संगीत को ही अपना जीवन बना लिया और पूरी ईमानदारी से उसे निभाया। उनके सरल स्वभाव, सादगीपूर्ण जीवन और सिद्धांतों पर अडिग रहने की प्रवृत्ति भी उनके पिता के संस्कारों का ही परिणाम है।
Q.10:
“मैंने अपने पिताजी का नाम, थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया।” ‘नाम आगे बढ़ाने’ का लता जी के लिए क्या अर्थ है? क्या यह सिर्फ प्रसिद्धि पाना है या इससे कोई महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है?
Solution:
लता मंगेशकर के लिए “नाम आगे बढ़ाने” का अर्थ केवल प्रसिद्धि पाना नहीं है, बल्कि अपने पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर के आदर्शों और मूल्यों को आगे बढ़ाना है। उन्होंने अपने जीवन में ईमानदारी, समर्पण और स्वाभिमान को अपनाकर अपने पिता के नाम को सम्मान दिलाया।
लता जी के अनुसार, नाम आगे बढ़ाना एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है। इसमें अपने काम को पूरी निष्ठा से करना, परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना और ऐसे कार्य करना शामिल है, जिससे लोगों के मन में सम्मान बना रहे। उन्होंने अपने संगीत और व्यवहार से यह साबित किया कि असली पहचान केवल प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों और मूल्यों से बनती है। इस तरह, “नाम आगे बढ़ाना” उनके लिए एक नैतिक कर्तव्य और आदर्श जीवन जीने का प्रतीक है।
Q.11:
किसी भी कार्य को पूरा करने में सहयोगियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। साक्षात्कार के आधार पर बताइए कि लता जी के अपने सहयोगियों के साथ संबंध कैसे थे?
Solution:
लता मंगेशकर के अपने सहयोगियों के साथ संबंध बहुत ही आत्मीय, सम्मानपूर्ण और सहयोगात्मक थे। उन्होंने बताया कि कोरस में गाने वाली लड़कियाँ उनके लिए परिवार जैसी थीं। वे सभी उनके घर आती-जाती थीं और वे भी उनके साथ जमीन पर बैठकर सहज रूप से बातें करती थीं। इससे उनके सरल और मिलनसार स्वभाव का पता चलता है।
संगीतकारों और अन्य कलाकारों के साथ भी उनका व्यवहार अत्यंत आदरपूर्ण था। वे अपने सीनियर संगीतकारों के घर त्योहारों पर मिठाई लेकर जाती थीं, जिससे उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता झलकती है। वे सभी के साथ मिलकर काम करती थीं और किसी प्रकार का अहंकार नहीं रखती थीं। इस प्रकार, उनके संबंध केवल पेशेवर नहीं, बल्कि भावनात्मक और पारिवारिक भी थे, जो सहयोग की भावना को दर्शाते हैं।
Q.12:
साक्षात्कार से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन पंक्तियों से लता मंगेशकर के व्यक्तित्व के कौनकौन से गुण या विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं? चुनकर लिखिए-
[दृढ़ता, कृतज्ञता, दार्शनिकता, समर्पण, उत्तरदायित्व, स्पष्टता, एकाग्रता, साधना, स्पष्टवादिता, विनम्रता, कठोरता, सरलता, आत्मविश्वास, उत्सवप्रियता, श्रद्धा, मानवता, अमरता, घमंड, स्वाभिमान]- “मुझे अपने गाने और रिकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की सुध नहीं रहती थी।”
- “अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।”
- “आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि में अमर हूँ, तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है।”
- “मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं।”
Solution:
- एकाग्रता, समर्पण, साधना
तर्क: इस पंक्ति से स्पष्ट है कि लता मंगेशकर पूरी तरह अपने संगीत में डूबी रहती थीं। उनका ध्यान केवल अपने काम पर था, जो उनकी गहरी लगन और निरंतर अभ्यास (साधना) को दर्शाता है। - आत्मविश्वास, स्वाभिमान, स्पष्टता
तर्क: यह पंक्ति उनके दृढ़ व्यक्तित्व को दिखाती है। सही बात पर डटे रहना और दूसरों के दबाव में न आना, उनके आत्मविश्वास और स्वाभिमान को प्रकट करता है। - विनम्रता, कृतज्ञता
तर्क: यहाँ वे अपनी प्रसिद्धि का श्रेय स्वयं को नहीं, बल्कि लोगों के प्रेम को देती हैं। यह उनकी विनम्रता और प्रशंसकों के प्रति आभार भावना को दर्शाता है। - दार्शनिकता, स्पष्टवादिता
तर्क: इस कथन में जीवन की सच्चाई को स्वीकार करने की भावना है। वे स्पष्ट रूप से कहती हैं कि शरीर नश्वर है, लेकिन कला अमर रहती है- यह उनके दार्शनिक दृष्टिकोण को दिखाता है।
Q.13:
नीचे दिए गए वाक्य को पढ़िए-
“संगीत में असीम शक्ति और अप्रत्याशित रचने की क्षमता होती है।”
इस वाक्य के आधार पर अनेक प्रश्न बनाए जा सकते हैं, जैसे-
- लता मंगेशकर ने संगीत के विषय में क्या कहा?
- लता मंगेशकर ने संगीत की क्या विशेषताएँ बताई हैं?
- लता मंगेशकर ने संगीत की क्षमता का आकलन करते हुए क्या कहा?
- उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर के कंसर्ट में हुई घटना से संगीत के बारे में क्या पता चलता है?
आपने देखा कि अनेक प्रश्नों का एक ही उत्तर हो सकता है और एक ही उत्तर से अनेक प्रश्न बनाए जा सकते हैं।
अब नीचे दिए गए उत्तरों से अधिक से अधिक प्रश्न बनाइए (कम से कम दो)-
- उत्तर: ‘मंगलागौर’ जैसे लोक पर्वों में स्त्रियों के बीच गीत, नृत्य और सौहार्द का भाव झलकता था।
- उत्तर: लता जी का मानना था कि तकनीकी प्रगति के बावजूद पुराने संगीतकारों की सादगी और गहराई अद्वितीय थी।
Solution:
- लता मंगेशकर ने संगीत के विषय में कहा कि उसमें असीम शक्ति और अप्रत्याशित प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता होती है। उनके अनुसार संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक ऐसी कला है जो मन और आत्मा को गहराई से प्रभावित करती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जब कोई कलाकार पूरी तन्मयता और शुद्ध सुर में संगीत प्रस्तुत करता है, तो उससे अद्भुत प्रभाव उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने उस्ताद अली अकबर खाँ के सरोद का तार टूटने की घटना का उल्लेख करते हुए यह समझाया कि गहरे सुर की तीव्रता भी असाधारण परिणाम ला सकती है। इस प्रकार, लता जी मानती हैं कि संगीत में ऐसी अद्भुत और अनंत शक्ति होती है, जो सामान्य अनुभव से परे जाकर चमत्कारिक प्रभाव पैदा कर सकती है।
- लता मंगेशकर ने संगीत की कई महत्वपूर्ण विशेषताएँ बताई हैं। उनके अनुसार संगीत में असीम (अनंत) शक्ति होती है, जो मन और भावनाओं को गहराई से प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि संगीत में अप्रत्याशित प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता होती है, यानी यह कभी-कभी ऐसे परिणाम दे सकता है जो सामान्य अनुभव से परे हों। संगीत आत्मा को छूने वाली कला है, जो श्रोता को भाव-विभोर कर सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि जब कोई कलाकार पूरी तन्मयता और शुद्ध सुर में गाता या बजाता है, तो उसका प्रभाव अत्यंत गहरा होता है। इस प्रकार, संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली और प्रभावशाली माध्यम है।
- लता मंगेशकर ने संगीत की क्षमता का आकलन करते हुए कहा कि इसमें असीम शक्ति और अप्रत्याशित रचने की क्षमता होती है। उनके अनुसार संगीत केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की भावनाओं और आत्मा को गहराई से प्रभावित करता है।
उन्होंने यह भी माना कि कभी-कभी संगीत इतना प्रभावशाली हो जाता है कि वह असाधारण अनुभव उत्पन्न कर सकता है। हालाँकि तानसेन जैसी कथाओं को वे निश्चित रूप से सिद्ध नहीं मानतीं, फिर भी उनका विश्वास है कि सच्चे सुर और पूर्ण तन्मयता से किया गया संगीत कुछ अनोखा और चमत्कारी प्रभाव जरूर पैदा कर सकता है। इस प्रकार, उन्होंने संगीत को एक शक्तिशाली और अद्भुत कला के रूप में स्वीकार किया है। - लता मंगेशकर के अनुसार उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर के कंसर्ट में हुई घटना से यह पता चलता है कि संगीत में अद्भुत और गहरी शक्ति होती है। कंसर्ट के दौरान जब अली अकबर ख़ाँ पूरी तन्मयता से सरोद बजा रहे थे, तब अचानक उनका तार टूट गया। इस पर उन्होंने कहा कि “जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।”
इस घटना से स्पष्ट होता है कि जब संगीत पूरी शुद्धता, भावना और समर्पण के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो उसका प्रभाव अत्यंत तीव्र और असाधारण हो सकता है। यह संगीत की गहराई, उसकी शक्ति और कलाकार की साधना को दर्शाता है।
आपने देखा कि अनेक प्रश्नों का एक ही उत्तर हो सकता है और एक ही उत्तर से अनेक प्रश्न बनाए जा सकते हैं।
अब नीचे दिए गए उत्तरों से अधिक से अधिक प्रश्न बनाइए (कम से कम दो)-
- दिए गए उत्तर के आधार पर बनाए गए प्रश्न-
- ‘मंगलागौर’ जैसे लोक पर्वों में किस प्रकार का वातावरण देखने को मिलता था?
- ‘मंगलागौर’ के उत्सव में स्त्रियों की क्या भूमिका होती थी?
- लोक पर्व ‘मंगलागौर’ भारतीय समाज में किस प्रकार के सामाजिक संबंधों को दर्शाता है?
- ‘मंगलागौर’ के अवसर पर स्त्रियों के बीच कौन-कौन सी गतिविधियाँ होती थीं?
- ‘मंगलागौर’ जैसे पर्वों से समाज में किस प्रकार का भाव प्रकट होता है?
- दिए गए उत्तर के आधार पर बनाए गए प्रश्न-
- लता जी के अनुसार पुराने संगीतकारों की कौन-सी विशेषताएँ उन्हें अद्वितीय बनाती थीं?
- तकनीकी प्रगति के संदर्भ में लता जी ने पुराने और नए संगीतकारों के बारे में क्या विचार व्यक्त किए?
- लता जी पुराने संगीतकारों की तुलना में आधुनिक संगीतकारों के बारे में क्या मानती थीं?
- पुराने संगीतकारों की सादगी और गहराई के बारे में लता जी का क्या मत था?
Q.14:
“अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।”
क्या आप किसी ऐसी स्थिति से गुजरे हैं जब आपको किसी सही बात पर अकेले खड़ा होना पड़ा हो? कब और क्यों?
Solution:
हाँ, ऐसी स्थिति कई लोगों के जीवन में आती है जब सही बात के लिए अकेले खड़ा होना पड़ता है। मेरे अनुभव के अनुसार, एक बार कक्षा में कुछ छात्र परीक्षा के दौरान नकल करने की योजना बना रहे थे। उन्होंने मुझे भी साथ देने के लिए कहा, लेकिन मुझे यह गलत लगा। मैंने साफ मना कर दिया और ईमानदारी से परीक्षा देने का निर्णय लिया। उस समय कुछ साथियों ने मेरा मज़ाक भी उड़ाया और मुझे अलग महसूस हुआ, लेकिन मैंने अपने निर्णय पर कायम रहना उचित समझा।
बाद में जब परिणाम आया, तो मुझे अपनी मेहनत का फल मिला और आत्मसंतोष भी हुआ। इस अनुभव से यह समझ में आया कि सही बात पर डटे रहना आसान नहीं होता, लेकिन अंत में वही सबसे सही और सम्मानजनक रास्ता होता है।
Q.15:
“बाबा ने जैसा सिखाया था, उस पर हम सभी भाई-बहनों ने चलने का प्रयास किया।”
आपके परिवार में भी कोई ऐसी सीख या नियम अवश्य होंगे जिनका पालन आप किसी के याद दिलाए बिना स्वतः करते होंगे, उनके विषय में बताइए।
Solution:
मेरे परिवार में भी कुछ ऐसी सीखें हैं, जिनका पालन मैं बिना किसी के कहे स्वयं करता हूँ। सबसे महत्वपूर्ण सीख है बड़ों का सम्मान करना और उनसे विनम्रता से बात करना। घर में यह नियम है कि कोई भी निर्णय हो, पहले सबकी राय सुनी जाए।
इसके अलावा हमें ईमानदारी और मेहनत का महत्व बचपन से सिखाया गया है, इसलिए मैं अपने काम खुद करने और सच बोलने की कोशिश करता हूँ। एक और आदत है समय का पालन करना, जैसे पढ़ाई और अन्य कार्य समय पर पूरा करना।
ये सारी बातें धीरे-धीरे आदत बन गई हैं, इसलिए अब इन्हें निभाने के लिए किसी के याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ती। मुझे लगता है कि ऐसी सीखें व्यक्ति के अच्छे चरित्र के निर्माण में बहुत मदद करती हैं।
Q.16:
“पहले दिन गुड़ि बाँधने के बाद नौ दिन तक उत्सव मनाया जाता है।”
आप भी अपने घर में किसी पारंपरिक पर्व को विशेष तरीके से मनाते होंगे। उसका वर्णन कीजिए।
Solution:
हमारे घर में दीवाली का पर्व बहुत विशेष तरीके से मनाया जाता है। इस दिन सुबह से ही घर की साफ-सफाई और सजावट शुरू हो जाती है। शाम को सभी लोग मिलकर घर में दीपक जलाते हैं और रंगोली बनाते हैं। इसके बाद पूरे परिवार के साथ लक्ष्मीगणेश की पूजा की जाती है, जिसमें सभी सदस्य शामिल होते हैं।
पूजा के बाद हम एक-दूसरे को मिठाई खिलाते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। बच्चे पटाखे भी जलाते हैं, हालांकि अब हम कम पटाखे चलाने की कोशिश करते हैं ताकि पर्यावरण को नुकसान न हो। इस दिन घर में खुशी, उत्साह और आपसी प्रेम का माहौल होता है।
इस प्रकार, यह पर्व केवल उत्सव ही नहीं, बल्कि परिवार को एक साथ जोड़ने और परंपराओं को निभाने का भी अवसर होता है।
Q.17:
“बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर आहिस्ता-आहिस्ता वह भी अब खत्म हो रहा है।”
पाठ में आपने पढ़ा कि लता मंगेशकर के बचपन से अब तक उत्सवों से जुड़ी अनेक परंपराएँ बदल रही हैं। कौन-कौन सी परंपराएँ बदल गई हैं? अपने घर-परिवार में बातचीत करके पता लगाइए कि विभिन्न त्योहारों को मनाने के तरीकों में कौन-कौन से बदलाव आ रहे हैं?
Solution:
समय के साथ त्योहारों को मनाने के तरीके काफी बदल गए हैं। लता मंगेशकर के बचपन में जैसे मंगलागौर में स्त्रियाँ इकट्ठा होकर पारंपरिक गीत गाती थीं, नृत्य करती थीं और पूरे उत्सव में सादगी व अपनापन होता था, वैसी परंपराएँ अब धीर-धीरे कम होती जा रही हैं। पहले त्योहारों में सामूहिकता, लोकगीत, घर का बना भोजन और धार्मिक विधियों का महत्व अधिक था।
आजकल मेरे घर-परिवार में भी कुछ बदलाव देखने को मिलते हैं-अब लोग समय की कमी के कारण सरल तरीके से पूजा करते हैं, बाजार से बनी मिठाइयाँ लाते हैं और पारंपरिक गीतों की जगह मोबाइल या टीवी का सहारा लेते हैं। पहले की तरह सबका एक साथ बैठकर लंबे समय तक उत्सव मनाना कम हो गया है।
इस प्रकार, त्योहार आज भी मनाए जाते हैं, लेकिन उनमें सादगी और सामूहिकता की जगह आधुनिकता और सुविधा अधिक दिखाई देती है।
Q.18:
‘ऐसी भी बातें होती हैं’ एक साक्षात्कार है। साक्षात्कार में एक व्यक्ति प्रश्न पूछता है और दूसरा व्यक्ति उन प्रश्नों के उत्तर देता है। साक्षात्कार विधा के कुछ मुख्य बिंदु आगे दिए गए हैं। इस साक्षात्कार में से इन मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करने वाली पंक्तियों को ढूँढकर लिखिए।
साक्षात्कार के मुख्य बिंदु
- साक्षात्कार लेने वाले का नाम और जिसका साक्षात्कार लिया गया, उसका नाम
- प्रश्नोत्तर
- भावनात्मक वातावरण
- आमंत्रण, स्वागत और परिचय
- उत्तर देने की शैली का संकेत
- विचार और उदाहरण
- संस्मरण
- समापन
Solution:
अध्याय ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ के आधार पर साक्षात्कार विधा के मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करने वाली पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
- साक्षात्कार लेने वाले का नाम और जिसका साक्षात्कार लिया गया, उनका नाम:
- पंक्ति: “यतींद्र मिश्र (साक्षात्कारकर्ता) और ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर (साक्षात्कार विधा)।”
- स्पष्टीकरण: पाठ के प्रारंभ में यतींद्र मिश्र का परिचय दिया गया है और स्पष्ट किया गया है कि वे लता मंगेशकर से बातचीत कर रहे हैं।
- प्रश्नोत्तर:
- पंक्ति: “यतींद्र मिश्र: दीदी, आपके पिताजी पंडित दीनानाथ मंगेशकर जी शास्त्रीय संगीत के बड़े कलाकार थे… लता मंगेशकर: हाँ, पिताजी बहुत ही अनुशासनप्रिय और संगीत के प्रति समर्पित थे।”
- स्पष्टीकरण: पूरे पाठ में प्रश्न और उनके सामने उत्तर दिए गए हैं।
- भावनात्मक वातावरण:
- पंक्ति: “दीदी की आँखें अपने पिताजी की याद में कुछ नम-सी हो गईं, उन्होंने बहुत ही संजीदगी से अपनी बात कही।”
- स्पष्टीकरण: यह पंक्ति साक्षात्कार के दौरान बने भावुक और गंभीर माहौल को दर्शाती है।
- आमंत्रण, स्वागत और परिचय:
- पंक्ति: “आज हमारे बीच उपस्थित हैं सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर… दीदी, हमारे इस संवाद में आपका बहुत-बहुत स्वागत है।”
- स्पष्टीकरण: साक्षात्कार की शुरुआत में अतिथि का परिचय और स्वागत इन्हीं शब्दों से होता है।
- उत्तर देने की शैली का संकेत:
- पंक्ति: “लता जी ने बहुत ही सरल और सहज मुस्कान के साथ उत्तर देना शुरू किया।” या “वे बड़ी बेबाकी से अपनी यादें साझा कर रही थीं।”
- स्पष्टीकरण: यह शब्द बताते हैं कि उत्तर देने वाला किस मानसिक स्थिति या ढंग से बात कर रहा है।
- विचार और उदाहरण:
- पंक्ति: “संगीत में ऐसी अपरिमित शक्ति है जो असंभव को संभव कर दे, जैसे बाबा हरिदास और तानसेन की कथाएँ हमें बताती हैं।”
- स्पष्टीकरण: यहाँ लता जी ने संगीत की शक्ति पर अपना विचार रखा है और प्राचीन कथाओं का उदाहरण दिया है।
- संस्मरण (यादें):
- पंक्ति: “मुझे याद है, पिताजी हमें साथ बैठाकर रियाज़ कराया करते थे और छोटी-सी गलती होने पर भी बड़े प्रेम से सुधारते थे।”
- स्पष्टीकरण: यहाँ लता जी ने अपने बचपन की याद या घटना (संस्मरण) को साझा किया है।
- समापन:
- पंक्ति: “यतींद्र मिश्र: दीदी, आपसे बात करना हम सबके लिए गौरव की बात है। अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”
- स्पष्टीकरण: साक्षात्कार के अंत में कृतज्ञता प्रकट करते हुए बातचीत को समाप्त किया गया है।
Q.19:
“मैं कोशिश करूँगी कि जो कुछ भी मैंने संगीत में रहते हुए जाना है, उसे आपको बता सकूँ|”
इस कथन से साक्षात्कार की शैली के विषय में क्या पता चलता है-क्या यह औपचारिक संवाद है या आत्मीय बातचीत? अपने विचार तर्क सहित लिखिए।
Solution:
इस कथन के आधार पर साक्षात्कार की शैली के विषय में निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं:
यह एक आत्मीय बातचीत है।
इसके पीछे के मुख्य तर्क इस प्रकार हैं:
- ‘कोशिश’ शब्द का प्रयोग: लता जी द्वारा “मैं कोशिश करूँगी” कहना उनकी विनम्रता और सहजता को दर्शाता है। एक सख्त औपचारिक (Formal) साक्षात्कार में उत्तर नपे-तुले होते हैं, लेकिन यहाँ वे अपने अनुभव को दिल से साझा करने का प्रयास कर रही हैं।
- अनुभवों का साझा करना: “जो कुछ भी मैंने संगीत में रहते हुए जाना है” — यह पंक्ति दर्शाती है कि यह केवल एक प्रश्न-उत्तर सत्र नहीं है, बल्कि वे अपने जीवन के गहरे अनुभवों और सीखने की यात्रा को सामने वाले के साथ बाँटना चाहती हैं। यह एक गुरु या मार्गदर्शक जैसी आत्मीयता को प्रकट करता है।
- उत्तर देने की तत्परता: यह कथन यह भी बताता है कि साक्षात्कार देने वाला व्यक्ति (लता जी) साक्षात्कारकर्ता के प्रति सम्मान रखता है और बिना किसी झिझक के खुलकर अपनी बातें कहने के लिए तैयार है।
- भावनात्मक जुड़ाव: ‘बता सकूँ’ कहना एक प्रकार के भावनात्मक जुड़ाव का संकेत देता है, जहाँ वक्ता और श्रोता के बीच की दूरी खत्म हो जाती है और संवाद ‘साक्षात्कार’ न रहकर एक ‘आत्मीय चर्चा’ बन जाता है।
निष्कर्ष: अतः यह कथन स्पष्ट करता है कि यह संवाद किसी निश्चित नियम या औपचारिकता में बँधा हुआ नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, स्नेह और अनुभवों के आदान-प्रदान से भरी एक आत्मीय बातचीत है।
Q.20:
“आप पूछिए, मैं आपके प्रश्नों का जवाब देने के लिए तैयार हूँ।”
प्रस्तुत पाठ में विश्व-प्रसिद्ध व्यक्तित्व का साक्षात्कार दिया गया है। कल्पना कीजिए कि आप भी लता मंगेशकर के इस साक्षात्कार में उपस्थित हैं। आप लता जी से कौन-कौन से अलग प्रश्न पूछते और क्यों?
Solution:
यह एक बहुत ही दिलचस्प कल्पना है। यदि मैं उस साक्षात्कार में उपस्थित होता, तो लता जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके लंबे अनुभव को देखते हुए उनसे निम्नलिखित अलग प्रश्न पूछता:
प्रश्न: “दीदी, आज के दौर में तकनीक (Technology) बहुत उन्नत हो गई है, जिससे सुरों को ठीक किया जा सकता है। क्या आपको लगता है कि इससे गायकी की वह ‘साधना’ कम हो गई है जो आपके समय में हुआ करती थी?”
- क्यों: मैं यह जानना चाहता कि एक ऐसी कलाकार, जिसने बिना किसी मशीनरी मदद के घंटों रियाज़ करके अपनी आवाज़ को साधा, वह आज के ‘ऑटो-ट्यून’ के दौर को किस नज़रिए से देखती हैं।
प्रश्न: “अपने हज़ारों गानों में से, क्या कोई ऐसा गीत है जिसे गाते समय आप वास्तव में रो पड़ी थीं या जिसे रिकॉर्ड करने के बाद आप कई दिनों तक उसके प्रभाव से बाहर नहीं आ पाईं?”
- क्यों: लता जी के गीतों में जो भावुकता है, उसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि कलाकार का अपना जुड़ाव उस रचना के साथ कितना गहरा था।
प्रश्न: “आपने कई पीढ़ियों के संगीतकारों और गायकों के साथ काम किया है। बदलते समय के साथ संगीत के ‘स्वाद’ और ‘रूह’ में आपको क्या सबसे बड़ा बदलाव महसूस हुआ?”
- क्यों: उनके पास भारतीय संगीत के स्वर्ण युग से लेकर आधुनिक युग तक का अनुभव था। उनके माध्यम से हम संगीत के क्रमिक विकास (Evolution) को बेहतर समझ पाते।
प्रश्न: “जब पूरा विश्व आपको एक ‘देवी’ की तरह पूजता है और ‘सुर कोकिला’ कहता है, तो क्या कभी आपको सामान्य जीवन जीने की या भीड़ में गुमनाम होकर घूमने की इच्छा होती है?”
- क्यों: सफलता के शिखर पर पहुँचे व्यक्ति के भीतर के ‘साधारण मनुष्य’ और उसकी एकाकी इच्छाओं को जानने के लिए यह प्रश्न महत्वपूर्ण होता।
इन प्रश्नों के माध्यम से मैं लता जी के केवल एक ‘गायिका’ वाले पक्ष को ही नहीं, बल्कि उनके एक ‘चिंतक’ और ‘साधारण इंसान’ वाले पक्ष को भी करीब से जान पाता।
Q.21:
“एक स्टूडियो से दूसरे और तीसरे स्टूडियो के चक्कर में ही पूरा दिन बीत जाता था।”
सन् 1942 में अपने पिता की मृत्यु के बाद लता मंगेशकर ने अकेले अपनी माँ, छोटे भाई-बहनों की देखभाल की और अपने घर को सँभाला। उस समय उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी। तब महिलाओं का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। उस समय सुबह से रात तक एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भागते हुए लता जी के एक दिन की कल्पना कीजिए। इस भागदौड़ में वे किन-किन चुनौतियों का सामना करती होंगी?
Solution:
सन् 1942 में अपने पिता की मृत्यु के बाद, मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में लता जी के कंधों पर पूरे परिवार का बोझ आ गया था। उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों और उनके संघर्ष को देखते हुए उनके एक दिन की भागदौड़ और चुनौतियों की कल्पना कुछ इस प्रकार की जा सकती है:
एक दिन की कल्पना और चुनौतियाँ:
- कठिन यात्रा और थकान: उस समय आज की तरह आवाजाही के सुगम साधन नहीं थे। एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो जाने के लिए उन्हें पैदल चलना पड़ता था या ताँगे और ट्राम का सहारा लेना पड़ता था। चिलचिलाती धूप या बारिश में घंटों सफर करने के कारण 13 साल की उस बच्ची का शरीर बुरी तरह थक जाता होगा, लेकिन घर की ज़िम्मेदारी उन्हें रुकने नहीं देती थी।
- भोजन की समस्या: काम की तलाश और रिकॉर्डिंग के चक्कर में अक्सर भोजन का समय अनिश्चित रहता होगा। कई बार जेब में पैसे बचाने की खातिर या काम की अधिकता के कारण उन्हें पूरा दिन भूखे पेट या केवल पानी पीकर गुज़ारना पड़ता होगा। एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो के बीच भागते हुए उन्हें ढंग से बैठने तक का समय नहीं मिलता होगा।
- यात्रा-भाड़ा और आर्थिक तंगी: पिता के जाने के बाद घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। उनके पास जो भी थोड़े-बहुत पैसे होते, उन्हें वह यात्रा-भाड़े (बस या ट्रेन के टिकट) और घर के राशन के बीच बहुत सोच-समझकर खर्च करती होंगी। कभी-कभी पैसे बचाने के लिए वे लंबी दूरी भी पैदल ही तय करती होंगी ताकि उन पैसों से छोटे भाई-बहनों के लिए कुछ ले जा सकें।
- सुरक्षा की चिंता: उस दौर में फ़िल्म जगत में महिलाओं का काम करना सम्मानजनक नहीं माना जाता था। ऐसे माहौल में एक छोटी बच्ची का सुबह से देर रात तक अकेले स्टूडियो के चक्कर काटना सुरक्षा की दृष्टि से बहुत चुनौतीपूर्ण रहा होगा। अपरिचित लोगों के बीच खुद को सुरक्षित रखते हुए गरिमा के साथ काम करना उनकी बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
निष्कर्ष: लता जी का वह समय केवल ‘भागदौड़’ नहीं बल्कि एक ‘कठिन तपस्या’ था। भूख, प्यास, थकान और समाज के तानों को सहते हुए उन्होंने जिस तरह अपने परिवार को सँभाला, वही संघर्ष आगे चलकर उनकी आवाज़ में वह गहराई और संजीदगी लेकर आया जिसने उन्हें ‘स्वर कोकिला’ बनाया।
Q.22:
“पहले के दौर में पुरुष और स्त्री आवाज़ों के कोरस हम लोगों के गीतों के साथ ही रेकॉर्ड होते थे। भले ही वह गाना डुएट हो या फिर कोई सोलो सॉन्ग।”
अपने घर, आस-पड़ोस, समुदाय, विद्यालय में होने वाले उन कार्यों के विषय में बताइए जिसमें सहयोग और सामूहिकता की आवश्यकता होती है।
Solution:
पाठ में लता जी ने बताया है कि पहले के समय में सोलो या डुएट गानों के लिए भी पूरी टीम (कोरस और वाद्ययंत्र) एक साथ बैठकर रिकॉर्डिंग करती थी। यह सामूहिकता और आपसी तालमेल का बेहतरीन उदाहरण है। हमारे दैनिक जीवन में भी ऐसे कई कार्य हैं जहाँ सहयोग अनिवार्य है:
- घर में: विवाह उत्सव, पूजा या त्योहारों की तैयारी सामूहिक सहयोग के बिना अधूरी है। घर की सफाई से लेकर मेहमानों के स्वागत तक, परिवार के सभी सदस्य मिलकर कार्य करते हैं।
- आस-पड़ोस और समुदाय: सार्वजनिक उत्सव (जैसे गणेश उत्सव या दिवाली), स्वच्छता अभियान और आपदा के समय पड़ोसी एक-दूसरे की मदद करते हैं। खेलों के आयोजन में भी पूरी टीम की एकजुटता आवश्यक होती है।
- विद्यालय: स्कूल में एनुअल फंक्शन (वार्षिक उत्सव), विज्ञान प्रदर्शनी या खेलकूद प्रतियोगिताएं सामूहिकता के आधार पर ही सफल होती हैं। कक्षा में ‘ग्रुप प्रोजेक्ट’ करते समय भी छात्र एक-दूसरे के कौशल का उपयोग कर साझा लक्ष्य प्राप्त करते हैं।
निष्कर्ष: जिस प्रकार संगीत में एक मधुर रचना के लिए गायक, वादक और कोरस का साथ होना ज़रूरी है, वैसे ही समाज की प्रगति के लिए आपसी सहयोग और एकता की आवश्यकता होती है।
Q.23:
“फिर उसमें लंबी-लंबी रागदारी वाले गायन की भी परंपरा थी।”
रागदारी वाले गायन का अर्थ है भारतीय शास्त्रीय संगीत। आपने इस पाठ में संगीत से जुड़े अनेक शब्दों को पढ़ा है। शब्दकोश, इंटरनेट, पुस्तकालय और अपने शिक्षकों की सहायता से इनके अर्थ और उदाहरण खोजकर लिखिए-
राग, सुर, बंदिश, अभंग, सोहर, फाग, बधावा
Solution:
पाठ में आए संगीत से जुड़े प्रमुख शब्दों के अर्थ और उदाहरण निम्नलिखित हैं:
- राग: स्वरों का वह विशिष्ट समूह जो कानों को प्रिय लगे और मन को प्रसन्न करे। उदाहरण: राग यमन, राग भैरवी।
- सुर (स्वर): संगीत की वह ध्वनि जो एक निश्चित कंपन पर आधारित होती है। मुख्य रूप से सात सुर होते हैं। उदाहरण: सा, रे, गा, मा, पा, धा, नी।
- बंदिश: शास्त्रीय संगीत में राग के नियमों में बँधी हुई वह रचना जिसे गाया जाता है। इसमें शब्द, लय और ताल का मिश्रण होता है।
- अभंग: यह विठ्ठल (भगवान विष्णु) की स्तुति में गाए जाने वाले मराठी भक्ति काव्य का एक रूप है। उदाहरण: संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर के अभंग।
- सोहर: यह उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध लोकगीत है, जो बालक के जन्म के अवसर पर खुशी प्रकट करने के लिए गाया जाता है।
- फाग: होली के उत्सव पर गाए जाने वाले लोकगीतों को ‘फाग’ कहा जाता है। इसमें उमंग और उल्लास का भाव होता है।
- बधावा: किसी शुभ अवसर, जैसे विवाह या संतान जन्म पर बधाई देने के लिए गाए जाने वाले मंगल गीतों को बधावा कहते हैं।
ये सभी शब्द भारतीय संगीत की विविधता और उसकी समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं, जहाँ शास्त्रीय और लोक संगीत का अद्भुत संगम मिलता है।
Q.24:
“त्योहारों के संदर्भ में एक बात और ध्यान में आती है कि अधिकांश प्रदेशों में पर्वों व अनुष्ठानों से संदर्भित घर-घर गीत गाए जाने का प्रचलन रहा है।” आपने पढ़ा कि भारत में त्योहारों पर फाग, धमार, सोहर, बधावा, छठ के गीत आदि गाने की परंपरा है। अपने क्षेत्र में गाए जाने वाले ऐसे गीतों के विषय में अपने घर में पता कीजिए और एक गीत अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
Solution:
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में त्योहारों और विशेष अवसरों पर लोकगीत गाने की एक समृद्ध परंपरा रही है, जिसका उल्लेख अध्याय में भी किया गया है। उत्तर भारत, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्रों में, बच्चे के जन्म के अवसर पर ‘सोहर’ गाने का विशेष महत्व है। यह गीत न केवल खुशी का प्रतीक है, बल्कि घर की महिलाओं द्वारा सामूहिकता और स्नेह के साथ गाया जाता है।
इसी परंपरा का एक उदाहरण नीचे दिया गया सोहर गीत है, जिसे जन्म के उत्सव पर गाया जाता है:
“जुग-जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो।
ललना लाल हुई हैं, कुलवा के दीपक, मनवा में आस जागल हो।”
गीत का भाव: इस गीत में नवजात शिशु के दीर्घायु होने की कामना की गई है और यह विश्वास व्यक्त किया गया है कि बच्चे के आने से घर का भाग्य जाग गया है। यह बालक कुल का नाम रोशन करेगा, जिससे परिवार के मन में नई आशाएं जागी हैं।
जिस प्रकार महाराष्ट्र में ‘मंगलागौर’ के अवसर पर स्त्रियाँ मुग्ध भाव से नृत्य और गायन करती हैं, उसी प्रकार सोहर जैसे गीत हमारे सामाजिक ताने-बाने और उत्सवों की आत्मीयता को जीवित रखते हैं।
क्या आपके यहाँ भी किसी विशेष त्योहार, जैसे दिवाली या होली पर इसी तरह के कोई पारंपरिक क्षेत्रीय गीत गाए जाते हैं?
Q.25:
“आज, जो स्थिति है और जिस तरह हमारी तकनीक विकसित हो चुकी है, उसमें अगर इन लोगों को काम करने का मौका मिलता, तब तो कमाल ही हो गया होता।”
- आज तकनीकी विकास इतना अधिक हो चुका है कि अनेक धोखेबाज/ठग कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग करके अपनी आवाज़ बदलकर लोगों के साथ धोखाधड़ी करते हैं। कक्षा में चर्चा कीजिए और बताइए कि साइबर सुरक्षा नियमों का प्रयोग करते हुए इस प्रकार की धोखाधड़ी से किस प्रकार बचा जा सकता है?
https://cybercrime.gov.in/UploadMedia/CyberSafetyHindi.Pdf
Solution:
साक्षात्कार में लता जी ने तकनीक के विकास पर चर्चा की है, लेकिन वर्तमान समय में इसी तकनीक (विशेषकर AI या कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का दुरुपयोग ‘वॉयस क्लोनिंग’ जैसी धोखाधड़ी के लिए भी किया जा रहा है। साइबर सुरक्षा नियमों का पालन करके हम इस प्रकार की धोखाधड़ी से निम्नलिखित तरीकों से बच सकते हैं:
- आवाज़ की पहचान और संदेह: यदि किसी परिचित या रिश्तेदार की आवाज़ में फोन आए और वे आपातकालीन स्थिति बताकर तुरंत पैसों की मांग करें, तो घबराएं नहीं और उनकी पहचान सुनिश्चित करने के लिए कोई ऐसा सवाल पूछें जिसका उत्तर केवल उन्हें ही पता हो।
- वापस फोन करके पुष्टि करना: कॉल काट दें और उस व्यक्ति के मूल नंबर पर स्वयं फोन करके सच्चाई का पता लगाएं। कभी भी अंजान नंबरों से आए निर्देशों पर तुरंत भरोसा न करें।
- गोपनीय जानकारी साझा न करें: किसी भी कॉल या संदेश पर अपना ओटीपी (OTP), पिन (PIN), या बैंक संबंधी विवरण साझा न करें।
- सोशल मीडिया पर सतर्कता: अपनी आवाज़ के नमूने या निजी वीडियो सोशल मीडिया पर सार्वजनिक (Public) न रखें, क्योंकि ठग इन्हीं का उपयोग एआई (AI) के जरिए आवाज़ बदलने के लिए करते हैं।
- आधिकारिक रिपोर्टिंग: यदि आपके साथ ऐसी कोई घटना होती है, तो तुरंत भारत सरकार के साइबर अपराध पोर्टल www.cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
जिस प्रकार पुराने समय में तकनीक की कमी के कारण कलाकारों को संघर्ष करना पड़ता था, आज तकनीक की अधिकता के कारण हमें मानसिक रूप से सतर्क रहने की आवश्यकता है।
Q.26:
“वे बस हमको गंभीरता से देखते थे… मगर हम सभी समझ जाते थे कि हमको बुलाया किसलिए गया है।”
- क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा व्यक्ति है जो बिना कुछ बोले सिर्फ नजरों या संकेतों (हाव-भाव) से ही आपको समझा देता है? उस अनुभव के विषय में बताइए।
- यदि कोई व्यक्ति बिना बोले (संकेत भाषा में) आपको कुछ समझा रहा है, तो वह आपके साथ और आप उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे?
(संकेत- धैर्य, जिज्ञासा, समानुभूति आदि)
Solution:
साक्षात्कार में लता मंगेशकर ने अपने पिता के अनुशासन और उनके बिना कुछ बोले अपनी बात कह देने के तरीके का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। इस प्रसंग के आधार पर आपके द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर यहाँ दिए गए हैं:
- बिना बोले संकेतों से समझने का अनुभव
हाँ, जीवन में अक्सर हमारे माता-पिता या घर के बड़े ऐसे व्यक्ति होते हैं जो बिना कुछ बोले ही अपनी नजरों से हमें बहुत कुछ समझा देते हैं। जैसे लता जी ने बताया कि जब वे बचपन में शरारत करती थीं, तो उनके पिताजी केवल गंभीरता से उन्हें देखते थे और वे समझ जाती थीं कि उनसे क्या गलती हुई है।
मेरा अनुभव भी कुछ ऐसा ही है। कभी-कभी जब घर में मेहमान आए होते हैं और हम बच्चे उत्साह में शोर मचाने लगते हैं, तो माँ की एक ‘गंभीर नजर’ ही यह बताने के लिए काफी होती है कि अब हमें शांत हो जाना चाहिए। उस समय उनकी चुप्पी किसी भी डाँट से अधिक प्रभावशाली होती है क्योंकि उसमें एक प्रकार का सम्मान और अनुशासन छिपा होता है। - संकेत भाषा (बिना बोले) में व्यवहार के तरीके
जब कोई व्यक्ति बिना बोले संकेतों के माध्यम से कुछ समझाने का प्रयास करता है, तो आपसी व्यवहार में निम्नलिखित गुण अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं:- धैर्य (Patience): संकेत भाषा को समझने में समय लग सकता है, इसलिए सामने वाले व्यक्ति को अपनी बात पूरी करने का पूरा समय देना चाहिए और बीच में टोकना नहीं चाहिए।
- जिज्ञासा (Curiosity): हमें सक्रिय रूप से उनकी भाव-भंगिमाओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए ताकि उनके संदेश का सही अर्थ निकाल सकें।
- समानुभूति (Empathy): उस व्यक्ति की स्थिति को महसूस करना आवश्यक है। यदि वह बोल नहीं पा रहा है या केवल संकेतों का सहारा ले रहा है, तो हमें उसे असहज महसूस कराए बिना अत्यंत संवेदनशीलता के साथ उत्तर देना चाहिए।
- एकाग्रता: जिस प्रकार लता जी अपने पिताजी को देखते ही समझ जाती थीं, वैसे ही हमें भी सामने वाले के चेहरे के हाव-भाव और आँखों के संकेतों पर पूरा ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
निष्कर्ष: बिना शब्दों का संचार ‘मौन’ की शक्ति को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि रिश्तों में गहराई होने पर शब्दों की आवश्यकता कम और समझ की आवश्यकता अधिक होती है।
Q.27:
“अगर हम समय के चक्र (टाइम मशीन) को घुमाकर सन् 1949-50 में ले जाएँ”, कल्पना कीजिए कि आपके पास टाइम मशीन है। 1940-50 के दशक में जाकर लता जी से मिलिए और उनके साथ बिताए गए एक दिन का वर्णन डायरी के रूप में लिखिए। उस समय की वेशभूषा, भोजन, संगीत आदि का वर्णन अवश्य कीजिए।
Solution:
साक्षात्कार में यतींद्र मिश्र ने जब ‘टाइम मशीन’ की कल्पना की, तो मन उस पुराने दौर की सादगी में खो गया। यदि मेरे पास वास्तव में एक टाइम मशीन होती और मैं सन् 1949-50 के उस सुनहरे युग में जाकर लता जी से मिल पाता, तो मेरी डायरी का एक पन्ना कुछ इस प्रकार होता:
30 अप्रैल, 1950
स्थान: बॉम्बे (मुंबई)
आज का दिन मेरे जीवन का सबसे अविस्मरणीय दिन रहा। मैं टाइम मशीन के जरिए उस दौर में पहुँचा जहाँ आज जैसी तकनीकी चकाचौंध तो नहीं थी, पर हवा में एक रूहानी सुकून था। मैंने खुद को एक पुराने स्टूडियो के बाहर पाया, जहाँ लता जी अपनी रिकॉर्डिंग के लिए आई हुई थीं।
वेशभूषा और वातावरण: वहाँ का माहौल आज के डिजिटल युग से बिल्कुल अलग था। लता जी एक अत्यंत सादी, सफेद सूती साड़ी पहने हुए थीं, जिसके पल्ले पर बारीक रंगीन धारियाँ थीं। उनकी सादगी में एक अनूठा तेज था। स्टूडियो में आज जैसी चमचमाती लाइट्स नहीं थीं, बल्कि एक भारी-सा माइक्रोफोन लटका हुआ था।
संगीत का अनुभव: मैंने उन्हें ‘महल’ फिल्म के गाने ‘आएगा आने वाला’ की रिहर्सल करते देखा। मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वे उस समय रिकॉर्डिंग के लिए हॉल में बहुत दूर से दबे पाँव चलकर माइक की तरफ आ रही थीं, ताकि स्वर के उतार-चढ़ाव को स्वाभाविक रूप से कैद किया जा सके। उस समय कोई ऑटो-ट्यून नहीं था, बस उनकी साधना और शुद्ध सुर था।
भोजन और बातचीत: दोपहर के भोजन के समय हमने साथ में सादा घर का बना खाना खाया। उस समय की बातचीत में भी एक अलग तरह का आदर और संस्कार था। उन्होंने बातों-बातों में बताया कि कैसे वे सुबह से रात तक एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो के चक्कर काटती हैं ताकि अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभा सकें। उनके पिता पं. दीनानाथ मंगेशकर जी की यादें उनकी बातों में एक प्रेरणा की तरह घुली हुई थीं।
शाम ढलते ही मैं वापस अपने समय में लौट आया, लेकिन वह 1950 का वह सादगी भरा दिन और लता जी का वह स्वाभिमानी व्यक्तित्व मेरे दिल में हमेशा के लिए बस गया।
Q.28:
“आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि मैं अमर हूँ तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है।”
कल्पना कीजिए कि यह लता जी का अंतिम संदेश है-आप उस पर अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया एक अनुच्छेद के रूप में व्यक्त कीजिए।
Solution:
लता मंगेशकर जी का यह कथन उनकी गहरी विनम्रता और महानता का परिचायक है, जो उन्हें संगीत की दुनिया में एक ध्रुव तारे की तरह स्थापित करता है। यदि यह उनका अंतिम संदेश होता, तो यह हमारे लिए केवल शब्द नहीं, बल्कि संगीत और मानवता की एक अमूल्य विरासत होती। उनके अनुसार शरीर नश्वर है, पर उनके द्वारा गाए गए अमर गीत आज भी करोड़ों दिलों की धड़कन बनकर जीवित हैं। उन्होंने सदैव अपने पिता के संस्कारों और स्वाभिमान को सर्वोपरि रखा, जिसने उन्हें सफलता के शिखर पर भी जमीन से जोड़े रखा। उनकी आवाज़ में वह असीम शक्ति थी जो रागों के माध्यम से भावनाओं को जीवित कर देती थी। यह प्यार और सम्मान जो उन्हें मिला, वह उनके अटूट संघर्ष और संगीत के प्रति पूर्ण समर्पण का ही प्रतिफल है। “गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन” की कहावत को चरितार्थ करते हुए लता जी अपनी आवाज़ के रूप में हमेशा हमारे बीच उपस्थित रहेंगी। यह संदेश हमें सिखाता है कि सच्ची अमरता प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि उन कर्मों में है जो दूसरों के जीवन में मिठास घोल सकें।
Q.29:
“मगर किसी के आगे जाकर हाथ नहीं पसारना है।”
उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित अंश मुहावरा है। हाथ पसारना या फैलाना का अर्थ है-कुछ माँगना या याचना करना। हाथों से जुड़े अनेक मुहावरे आपने पढ़े और सुने होंगे। ऐसे ही कुछ मुहावरे नीचे दिए गए हैं। इनका प्रयोग करते हुए वाक्य बनाइए-
- हाथ में आना
- हाथ का मैल होना
- हाथ से हाथ मिलाना
- हाथ साफ करना
- हाथ से निकल जाना
- हाथ धो बैठना
Solution:
लता मंगेशकर जी के जीवन संघर्ष और उनके पिता द्वारा दिए गए स्वाभिमान के संस्कारों से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी किसी के आगे हाथ नहीं पसारना चाहिए। हाथ से जुड़े अन्य मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग निम्नलिखित है:
- हाथ में आना (अधिकार में आना या प्राप्त होना): कठिन परिश्रम और वर्षों की साधना के बाद ही सफलता हाथ में आती है।
- हाथ का मैल होना (पैसे को तुच्छ समझना): लता जी के लिए पैसा हमेशा हाथ का मैल रहा, उन्होंने धन से अधिक अपने स्वाभिमान और परिवार के मूल्यों को महत्व दिया।
- हाथ से हाथ मिलाना (मिलकर काम करना या सहयोग करना): रिकॉर्डिंग के दौरान मुख्य गायक और कोरस की लड़कियाँ हाथ से हाथ मिलाकर काम करते थे, जिससे संगीत में मधुरता आती थी।
- हाथ साफ करना (चोरी करना या सफाई से काम निकालना): पुराने समय में जब तकनीक विकसित नहीं थी, तब संगीतकार नए-नए टोटकों से गीतों के प्रभाव पर अपना हाथ साफ करते थे।
- हाथ से निकल जाना (अवसर खो देना या नियंत्रण से बाहर होना): यदि समय रहते परिवार की जिम्मेदारी न सँभाली जाए, तो परिस्थितियाँ हाथ से निकल जाती हैं।
- हाथ धो बैठना (गँवा देना या खो देना): सावधानी न बरतने पर व्यक्ति अपनी मेहनत से कमाई गई पूंजी से हाथ धो बैठता है।
Q.30:
“‘गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन’। मतलब गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम है, वह रह जाता है।” आपने एक कहावत और उसका हिंदी में अर्थ पढ़ा। इस कहावत के अर्थ को अपने घर या क्षेत्र की भाषा अथवा भाषाओं में लिखिए।
Solution:
अध्याय ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ में लता मंगेशकर जी ने इस मराठी कहावत के माध्यम से जीवन की नश्वरता और कर्मों की अमरता को समझाया है। इस कहावत का मूल भाव यह है कि व्यक्ति का शरीर या भौतिक वस्तुएं समय के साथ समाप्त हो जाती हैं, लेकिन उसके द्वारा किए गए महान कार्य और उसका नाम युगों-युगों तक जीवित रहता है।
मेरे क्षेत्र की भाषा (हिंदी/ब्रज/खड़ी बोली) में इस अर्थ को व्यक्त करने वाली कुछ प्रमुख कहावतें और लोकोक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
- “नाम अमर रहता है, देह तो चाम है।” अर्थ: शरीर केवल चमड़ी का बना है जो नष्ट हो जाएगा, परंतु व्यक्ति का नाम उसके गुणों के कारण सदा जीवित रहता है।
- “बंदा मर जाता है, पर बात रह जाती है।” अर्थ: इंसान की मृत्यु हो जाती है, लेकिन उसके द्वारा कही गई बातें और किए गए काम दुनिया में याद रखे जाते हैं।
- “कीर्तिर्यस्य स जीवति।” (संस्कृत मूल की प्रचलित कहावत) अर्थ: जिसकी कीर्ति (यश) शेष है, वास्तव में वही जीवित है।
- “मानुष मरे दम न मरे, कीर्ति कभी न जाय।” अर्थ: मनुष्य मर जाता है परंतु उसका प्रभाव और उसका यश कभी नहीं मिटता।
ये सभी कहावतें लता जी द्वारा कही गई बात “मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं” का ही समर्थन करती हैं।
Q.31:
लता जी ने मराठी कहावत को हिंदी में समझाया। अब आप अपनी मातृभाषा की कोई कहावत चुनिए और उसका हिंदी में अनुवाद कीजिए। अनुवाद के बाद भाव में क्या परिवर्तन आया? लिखिए।
Solution:
साक्षात्कार में लता मंगेशकर जी ने मराठी कहावत के माध्यम से बताया कि शरीर नश्वर है परंतु नाम और कर्म अमर रहते हैं। इसी भाव को व्यक्त करने वाली मेरी मातृभाषा की एक कहावत और उसका विश्लेषण नीचे दिया गया है:
मातृभाषा की कहावत (भोजपुरी/हिंदी क्षेत्र)
“देहू माटी के पुतरी, कीर्ति अमर कहानी।”
हिंदी अनुवाद
यह शरीर मिट्टी की एक पुतली के समान है (जो अंत में मिट्टी में ही मिल जाएगा), लेकिन व्यक्ति द्वारा किए गए सत्कर्म और उसकी कीर्ति एक अमर कहानी की तरह सदा जीवित रहती है।
अनुवाद के बाद भाव में परिवर्तन
जब हम मूल कहावत का अनुवाद करते हैं, तो अर्थ तो वही रहता है, परंतु उसके शिल्प और प्रभाव में कुछ सूक्ष्म परिवर्तन आते हैं:
- लय और मिठास: मूल कहावत में जो लोक भाषा की लय और संक्षिप्तता होती है, वह अनुवाद में थोड़ी कम हो जाती है। मूल भाषा में बात अधिक सीधे और प्रभावशाली ढंग से दिल तक पहुँचती है।
- सांस्कृतिक गहराई: “माटी के पुतरी” जैसे शब्द मिट्टी से जुड़ाव और जीवन की क्षणभंगुरता को जितनी गहराई से व्यक्त करते हैं, “मिट्टी की पुतली” कहने पर वह भाव थोड़ा औपचारिक (Formal) हो जाता है।
- व्याख्या: अनुवाद करने पर कहावत का अर्थ अधिक स्पष्ट और विस्तारपूर्ण हो जाता है, जिससे वह उन लोगों को भी समझ आ जाती है जो उस विशेष क्षेत्रीय संस्कृति से परिचित नहीं हैं।
निष्कर्ष: जिस प्रकार लता जी ने मराठी कहावत का हिंदी भाव समझाया, उससे यह स्पष्ट होता है कि भाषाएँ अलग हो सकती हैं, पर भारतीय संस्कारों में कर्म और स्वाभिमान को अमर मानने का मूल भाव एक समान ही है।
Q.32:
एक ‘सेतु चित्र’ बनाइए जिसमें दो किनारे हों- एक किनारे पर हिंदी और दूसरे किनारे पर अपने घर या क्षेत्र की भाषा। दोनों किनारों के बीच में ऐसे शब्द लिखिए जो दोनों भाषाओं में समान अर्थ रखते हैं।
Solution:
अध्याय में लता मंगेशकर जी ने जिस प्रकार हिंदी और मराठी के बीच के भाषाई और सांस्कृतिक संबंधों को साझा किया है, वह हमें भाषाओं के आपसी जुड़ाव की याद दिलाता है।
यहाँ एक ‘सेतु चित्र’ का विवरण दिया गया है जो हिंदी और मेरे क्षेत्र की भाषा (जैसे भोजपुरी/मैथिली/उर्दू) के बीच के भाषाई पुल को दर्शाता है। ये ऐसे शब्द हैं जो दोनों किनारों को जोड़ते हैं क्योंकि इनका अर्थ और उच्चारण लगभग समान है:
| सेतु शब्द (समान अर्थ) | दोनों भाषाओं में महत्व |
| संगीत | दोनों भाषाओं में कला और सुरों के मेल को यही कहा जाता है। |
| पिताजी / बाबा | आदर और स्नेह के साथ पिता को संबोधित करने के लिए उपयोग किया जाता है। |
| प्रसाद | धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा के बाद मिलने वाले पवित्र भोजन के लिए समान शब्द। |
| संस्कार | परिवार से मिलने वाली सीख और मूल्यों के लिए दोनों क्षेत्रों में यही शब्द प्रचलित है। |
| त्योहार | उत्सवों और पर्वों के लिए उपयोग होने वाला साझा शब्द। |
| शास्त्रीय | संगीत की प्राचीन और नियमबद्ध परंपरा को दर्शाने वाला शब्द। |
| स्वाभिमान | आत्म-सम्मान की भावना, जिसे लता जी ने अपने पिता से सीखा था। |
यह सेतु चित्र दर्शाता है कि हमारी भाषाएँ अलग-अलग किनारों पर होने के बावजूद भी साझा शब्दों और संस्कृति के माध्यम से एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। जिस प्रकार लता जी ने मराठी संस्कारों को हिंदी पार्श्वगायन में पिरोया, वैसे ही ये शब्द हमारे भाषाई रिश्तों को मज़बूत करते हैं।
Q.33:
‘नाम रह जाएगा’ वाक्य के लिए एक सुंदर पोस्टर बनाइए। इसके ऊपर ‘नाम रह जाता है…’ लिखिए और नीचे विभिन्न भारतीय भाषाओं में ‘नाम’ शब्द (जैसे- नाव, नालो, नांउ, नाउँ, मिङ्, पेर, नामम् आदि) लिखिए। साथ ही कक्षा में सब विद्यार्थी मिलकर एक प्रतिज्ञा लें’ – ‘हम हर भाषा का सम्मान करेंगे।’
Solution:
पोस्टर: ‘नाम’ की भाषाई विविधता
पोस्टर की संरचना:
- शीर्षक (सबसे ऊपर): बड़े और सुनहरे अक्षरों में लिखिए: “नाम रह जाता है…”
- मध्य भाग (मुख्य चित्र): पोस्टर के बीच में एक ‘भाषा-वृक्ष’ का चित्र बनाइए जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति में हों। इसकी टहनियों और पत्तों पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में ‘नाम’ शब्द को कलात्मक ढंग से सजाइए:
- नाव (मराठी/कोंकणी)
- नालो (सिंधी)
- नांउ (पंजाबी)
- नाउँ (नेपाली)
- मिङ् (भोटिया/लेप्चा शैली)
- पेरु (तमिल/तेलुगु/मलयालम/कन्नड़ – पेरू/पेरुमु/पेयुरु)
- नामम् (संस्कृत)
- नाम (हिंदी/असमिया/ओड़िआ/बांग्ला)
- निचला भाग (प्रतिज्ञा): पोस्टर के सबसे नीचे एक स्पष्ट पट्टी पर बड़े अक्षरों में लिखिए: “हम हर भाषा का सम्मान करेंगे।”
कक्षा के लिए सामूहिक प्रतिज्ञा
पोस्टर तैयार होने के बाद, कक्षा के सभी विद्यार्थी अपने दाहिने हाथ को आगे बढ़ाकर एक स्वर में यह प्रतिज्ञा लें:
“हम, [विद्यालय का नाम] के विद्यार्थी, आज यह प्रतिज्ञा लेते हैं कि हम भारत की भाषाई विविधता पर गर्व करेंगे। जिस प्रकार लता जी ने संगीत के माध्यम से पूरे देश को जोड़ा, हम भी हर भाषा और उसकी संस्कृति का हृदय से सम्मान करेंगे। हम अपनी मातृभाषा के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति भी प्रेम और आदर का भाव रखेंगे।”
सुझाव: इस पोस्टर को बनाते समय विभिन्न रंगों का प्रयोग करें ताकि यह भारतीय संस्कृति की रंगीनी को दर्शा सके, जैसा कि लता जी ने अपने साक्षात्कार में विभिन्न त्योहारों और परंपराओं के माध्यम से स्पष्ट किया है।
Q.34:
कागज पर एक पेड़ का चित्र बनाइए। इसे नाम दीजिए- भाषा-वृक्ष। इसकी जड़ में लिखिए‘भारतीय संस्कृति’; तने पर और शाखाओं पर लिखिए- हिंदी, मराठी, तमिल, बांग्ला, गुजराती आदि। हर शाखा पर उस भाषा का एक प्यारा शब्द जोड़िए।
Solution:
अध्याय के भाषाई संगम और ‘नाम रह जाता है’ की अवधारणा के आधार पर एक कलात्मक ‘भाषा-वृक्ष’ का वर्णन यहाँ प्रस्तुत है, जिसे आप अपनी लेखन-पुस्तिका या चार्ट पेपर पर बना सकते हैं:
भाषा-वृक्ष की रूपरेखा
- जड़ (Root): पेड़ की सबसे मज़बूत नींव और जड़ों में ‘भारतीय संस्कृति’ लिखिए। यह दर्शाता है कि हमारी सभी भाषाओं का मूल आधार एक ही साझा संस्कृति और संस्कार हैं।
- तना (Trunk): वृक्ष के मुख्य तने पर ‘हिंदी’ लिखिए, क्योंकि यह देश की संपर्क भाषा के रूप में सभी को जोड़ने का काम करती है। तने पर हिंदी का एक प्यारा शब्द ‘आत्मीयता’ लिखिए।
- शाखाएँ (Branches): मुख्य तने से निकलती हुई विभिन्न शाखाओं पर निम्नलिखित भाषाएँ और उनके प्यारे शब्द अंकित कीजिए:
- मराठी: इस शाखा पर ‘मायबोली’ (मातृभाषा) शब्द लिखिए, जो लता जी की जड़ों से जुड़ा है।
- तमिल: यहाँ ‘अनबू’ (प्रेम) शब्द जोड़िए, जो दक्षिण भारतीय संस्कृति की मिठास को दर्शाता है।
- बांग्ला: इस शाखा पर ‘खूब भालो’ (बहुत अच्छा) लिखिए, जो इस भाषा की कोमलता का प्रतीक है।
- गुजराती: यहाँ ‘आभार’ (धन्यवाद) शब्द जोड़िए, जो कृतज्ञता के भाव को व्यक्त करता है।
निष्कर्ष: यह भाषा-वृक्ष हमें सिखाता है कि भले ही हमारी शाखाएँ (भाषाएँ) अलग-अलग दिशाओं में फैली हों, लेकिन हम सब एक ही ‘भारतीय संस्कृति’ की मिट्टी से पोषण प्राप्त करते हैं। यह वृक्ष विविधता में एकता का जीवंत संदेश देता है।
Q.35:
समूह में मिलकर किसी विषय पर एक छोटा समाचार बुलेटिन तैयार कीजिए जिसमें हिंदी, अंग्रेजी और किसी क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग हो। उदाहरण के लिए, एक विषय हो सकता है’ कला जो जोड़ती है, बाँटती नहीं।’
Solution:
अध्याय में लता मंगेशकर जी के व्यक्तित्व और उनके संगीत के माध्यम से हमने सीखा कि कला सीमाओं को तोड़कर लोगों को जोड़ती है। इसी विषय पर आधारित एक त्रिभाषी (Trilingual) समाचार बुलेटिन का प्रारूप यहाँ प्रस्तुत है:
समाचार बुलेटिन: “कला जो जोड़ती है, बाँटती नहीं”
एंकर (हिंदी): नमस्कार! आज के विशेष बुलेटिन में आपका स्वागत है। आज हम बात कर रहे हैं उस शक्ति की जो दिलों को मिलाती है- ‘कला’। जैसा कि लता मंगेशकर जी ने कहा, संगीत की सीमा अनंत है और यह सबको एक सूत्र में पिरोती है।
Reporter (English): Hello everyone! Art knows no boundaries. Whether it is music or painting, it speaks a universal language. As we saw in the interview, Lata Ji’s voice reached every corner of the world, proving that “Voices remain even when places fade”. It is truly a bridge between different cultures.
क्षेत्रीय प्रतिनिधि (मराठी/क्षेत्रीय): नमस्कार! कला ही माणसाला माणसाशी जोडते। लता दीदींनी आपल्या सुरांनी संपूर्ण देशाला एकत्र आणले। ‘मंगलागौर’ सारखे लोकसंगीत असो वा शास्त्रीय गायन, हे सर्व आपल्या संस्कृतीचा कणा आहे। (अर्थ: कला ही मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। लता दीदी ने अपने सुरों से पूरे देश को एक किया। मंगलागौर जैसा लोकसंगीत हो या शास्त्रीय गायन, ये सब हमारी संस्कृति की रीढ़ हैं।)
एंकर (हिंदी): अंत में, हम यही कहेंगे कि भाषाएँ अनेक हो सकती हैं, पर कला का संदेश केवल ‘प्रेम’ और ‘एकता’ है। धन्यवाद!
Q.36:
भाषाई स्मृति पोटली
अपने परिवार में प्रयुक्त अलग-अलग भाषाओं के पाँच शब्द एकत्र कीजिए (जैसे- दादी मराठी बोलती हों, माँ हिंदी)। उन्हें एक ‘शब्द पोटली’ में कार्ड पर सजाइए।
Solution:
अध्याय में जिस प्रकार लता मंगेशकर जी ने हिंदी और मराठी के भाषाई संगम को अपने जीवन में उतारा, वह हमें अपनी जड़ों की याद दिलाता है। मेरे परिवार की ‘भाषाई स्मृति पोटली’ में सजे पाँच विशेष शब्द और उनके कार्ड्स का विवरण यहाँ दिया गया है:
शब्द पोटली (Language Memory Bag)
- मराठी (दादी की भाषा): ‘आजी’ (दादी)
अर्थ: यह शब्द केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि परिवार के प्रति दादी के स्नेह और उनके द्वारा दिए गए संस्कारों का प्रतीक है। - हिंदी (माँ की भाषा): ‘ममता’ (स्नेह) अर्थ: माँ अक्सर इस शब्द का प्रयोग करती हैं, जो उनके निस्वार्थ प्रेम और परिवार के प्रति उनके उत्तरदायित्व को दर्शाता है।
- भोजपुरी (पिताजी की भाषा): ‘नेह’ (लगाव) अर्थ: पिताजी के लिए ‘नेह’ का अर्थ वह गहरा जुड़ाव है जो हम सभी भाई-बहनों को एक सूत्र में बाँधकर रखता है।
- संस्कृत (दादाजी की भाषा): ‘कृतज्ञता’ (आभार) अर्थ: जैसा कि लता जी ने अपने प्रशंसकों के प्रति आभार व्यक्त किया, वैसे ही दादाजी हमें हर छोटी चीज़ के लिए ईश्वर का धन्यवाद करना सिखाते हैं।
- क्षेत्रीय बोली (बुआ की भाषा): ‘सौहार्द’ (भाईचारा) अर्थ: यह शब्द त्योहारों के दौरान परिवार और पड़ोसियों के बीच की आत्मीयता और सामूहिक खुशी को व्यक्त करता है।
निष्कर्ष: यह पोटली हमें याद दिलाती है कि भले ही हमारे शब्द अलग हों, पर उनके पीछे की भावना और संस्कृति हमें एक ‘भारतीय’ के रूप में जोड़ती है। जिस प्रकार लता जी की आवाज़ में अनेक भाषाओं की मिठास घुली थी, यह पोटली भी हमारे परिवार की भाषाई विविधता का उत्सव है।
Q.37:
स्वर-कोलाज
लता जी के जीवन के प्रेरक वाक्यों और गीतों का चित्रमय कोलाज बनाइए।
Solution:
लता मंगेशकर जी का जीवन संगीत, साधना और स्वाभिमान का एक अद्भुत संगम है। उनके जीवन के प्रेरक वाक्यों और अमर गीतों पर आधारित ‘स्वर-कोलाज’ की रूपरेखा यहाँ प्रस्तुत है:
प्रेरक वाक्यों का कोलाज (Inspirational Quotes)
- स्वाभिमान का मंत्र: “अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है”।
- समर्पण की शक्ति: “मुझे अपने गाने और रिकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की सुध नहीं रहती थी”।
- विनम्रता और कृतज्ञता: “मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं। प्रभु! तुमने जो भी दिया, वह बहुत दिया”।
- संस्कारों की नींव: “पिताजी से सबसे ज्यादा स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा मिली”।
अमर गीतों का चित्रण (Musical Collage)
- संघर्ष और पहचान: “मेरी आवाज़ ही पहचान है”।
- प्रसिद्धि का सूत्रपात: “आएगा आने वाला” (महल) और “हवा में उड़ता जाए” (बरसात)।
- भावपूर्ण अभिव्यक्ति: “मेरे ख्वाबों में जो आए”।
कोलाज की सजावट: इस कोलाज के केंद्र में लता जी का एक सौम्य चित्र रखें, जिसके चारों ओर उनके रिकॉर्ड्स, माइक्रोफोन और संगीत के सुरों (सा, रे, ग, म) को कलात्मक ढंग से सजाया जा सकता है। यह कोलाज उनकी सादगी और संगीत के प्रति उनकी अखंड साधना का जीवंत प्रतीक है।
Q.38:
समय-रेखा
लता जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ कालानुक्रम में दर्शाइए।
Solution:
लता मंगेशकर: जीवन की समय-रेखा
- 1929: इंदौर, मध्य प्रदेश में जन्म।
- 1934 (लगभग): मात्र पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा लेनी शुरू की।
- 1942: पिताजी का निधन। 13 वर्ष की अल्पायु में ही परिवार की पूरी जिम्मेदारी और संघर्षों का दौर शुरू हुआ।
- 1940 का दशक (शुरुआती दौर): अभिनय के माध्यम से फिल्मों में प्रवेश। लगभग छह से सात फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें ‘छत्रपति शिवाजी’ (हिंदी और मराठी) प्रमुख थी।
- 1949-1950: पार्श्वगायन के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात। ‘महल’ (आएगा आने वाला), ‘बरसात’ (हवा में उड़ता जाए) और ‘बड़ी बहन’ (चले जाना नहीं नैन मिला के) जैसे कालजयी गीतों से प्रसिद्धि मिली।
- 1950 का दशक: संगीत जगत में अपनी मजबूत पहचान बनाई। अनिल बिस्वास, नौशाद, सज्जाद हुसैन और सी. रामचंद्र जैसे महान संगीतकारों के साथ काम किया।
- 1960: इस दौर के आसपास कोरस गायकों के एक विशेष समूह के साथ काम करना शुरू किया, जो लगभग 1980 तक उनके साथ रहा।
- जीवनपर्यंत: संगीत के प्रति पूर्ण समर्पण और ‘भारत रत्न’ जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से विभूषित होकर भारतीय संगीत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।
निष्कर्ष: लता जी का जीवन एक निरंतर साधना रहा है। उन्होंने अपने पिता से मिले ‘स्वाभिमान’ के संस्कार को मरते दम तक निभाया और विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी। जैसा कि वे स्वयं कहती थीं- “गाँव तो बह जाता है, लेकिन नाम रह जाता है”।
Q.39:
“उस दिन घर में संगीत की सभा होती थी।”
नीचे ‘संगीत’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
संगीत (हिंदी); सङ्गीतम् (संस्कृत); संगीत (पंजाबी); मूसीकी, मौसिकी (उर्दू); मूसीकी, संगीत (कश्मीरी); संगीत (सिंधी); संगीत कला (मराठी); संगीतकळा (ला) (गुजराती); संगीत (कोंकणी); संगीत (नेपाली); संगीत (बांग्ला); संगीत (असमिया); ईशै (मणिपुरी); संगीत (ओड़िआ); संगीतमु (तेलुगु); संगीतम्, इशै (तमिल); संगीतम् (मलयालम); संगीत (कन्नड़)।
- इनके अतिरिक्त यदि आप ‘संगीत’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
- उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
Solution:
अध्याय में संगीत को एक असीम शक्ति के रूप में दर्शाया गया है, जो किसी भी भाषा या बंधन से परे है। ‘संगीत’ शब्द के लिए विभिन्न भारतीय भाषाओं की सूची के अतिरिक्त, कुछ अन्य भाषाओं में इस शब्द के रूप इस प्रकार हैं:
- संथाली: राहाँ (Rāhā)
- मैथिली: संगीत
- डोगरी: संगीत
- बोडो: दामग्रा-मेन्थाय
- अंग्रेजी: म्यूजिक (Music)
मातृभाषा में वाक्य का अनुवाद:
चूँकि मेरी मातृभाषा हिंदी है, अतः उपर्युक्त वाक्य का स्वरूप वही रहेगा:
“उस दिन घर में संगीत की सभा होती थी।”
यदि इसे क्षेत्रीय बोलियों के प्रभाव के साथ देखा जाए (जैसे भोजपुरी/खड़ी बोली):
“ओह दिन घर में संगीत के सभा होत रहे।”
यह भाषाई विविधता हमें बताती है कि शब्द भले ही बदल जाएँ, लेकिन संगीत का मूल भाव- जो आत्मा को प्रसन्नता दे- सभी संस्कृतियों में एक समान रहता है। जिस प्रकार लता जी ने शास्त्रीय संगीत और सुगम संगीत दोनों में अपनी पकड़ बनाए रखी, वैसे ही ये सभी शब्द एक ही महान कला की ओर संकेत करते हैं।
Q.40:
“जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तब मुझे भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे।”
लता जी ने बचपन में मेडल पाने की कल्पना की और जीवन में अनगिनत पुरस्कार और मेडल प्राप्त भी किए। पता कीजिए कि उन्होंने जीवन-भर में कौन-कौन से ‘मेडल’ और पुरस्कार प्राप्त किए?
Solution:
लता मंगेशकर जी ने बचपन में पंडित कुमार गंधर्व को मेडल लगाकर गाते देख स्वयं भी वैसे ही मेडल पाने का सपना देखा था। उनका यह सपना न केवल पूरा हुआ, बल्कि वे भारतीय संगीत के इतिहास में सबसे अधिक सम्मानित कलाकार बनीं।
उनके द्वारा प्राप्त कुछ प्रमुख ‘मेडल’ और पुरस्कार निम्नलिखित हैं:
- भारत रत्न (2001): यह भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जो उनकी संगीत साधना के लिए दिया गया।
- दादा साहब फाल्के पुरस्कार (1989): भारतीय सिनेमा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए。
- पद्म विभूषण (1999) और पद्म भूषण (1969): कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवा हेतु।
- राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार: उन्होंने ‘पार्श्वगायन’ के लिए तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीते।
- लीजन ऑफ ऑनर (2007): फ्रांस सरकार द्वारा दिया गया सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
- फिल्मफेयर पुरस्कार: उन्होंने कई बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का पुरस्कार जीता और बाद में नए कलाकारों को अवसर देने के लिए इसे लेना छोड़ दिया।
लता जी की यह उपलब्धि दर्शाती है कि उन्होंने अपने पिता से मिले स्वाभिमान और समर्पण के बल पर उस बचपन के सपने को हकीकत में बदल दिया। उनके लिए ये पुरस्कार उनके प्रशंसकों द्वारा दिए गए अपार प्रेम का ही एक रूप थे।
Q.41:
पाठ में लता मंगेशकर ने कई फिल्मों और गीतों का उल्लेख किया है। इंटरनेट की सहायता से इनमें से किसी एक फिल्म और गीत को देखकर उसके विषय में अपने विचार लिखिए। आपको यह फिल्म और गीत कैसा लगा और क्यों?
Solution:
अध्याय में लता मंगेशकर जी ने अपने शुरुआती दौर की प्रसिद्ध फिल्म ‘महल’ (1949) और उसके कालजयी गीत ‘आएगा आने वाला’ का विशेष उल्लेख किया है। इस गीत के विषय में मेरे विचार निम्नलिखित हैं:
यह गीत भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में एक मील का पत्थर है। इसे सुनकर आज भी वही रहस्य और गहराई महसूस होती है, जिसका जिक्र लता जी ने साक्षात्कार में किया था। उन्होंने बताया कि उस समय तकनीक इतनी विकसित नहीं थी कि स्वर के उतार-चढ़ाव को मशीनों से नियंत्रित किया जा सके, इसलिए उन्हें हॉल में दूर से दबे पाँव चलकर माइक तक आना पड़ता था।
यह गीत और फिल्म मुझे निम्नलिखित कारणों से बहुत अच्छे लगे:
- सादगी और शुद्धता: आज के डिजिटल युग के शोर-शराबे के विपरीत, इस गीत में वाद्ययंत्रों का न्यूनतम उपयोग और लता जी की आवाज़ की शुद्धता मंत्रमुग्ध कर देती है।
- कलात्मक प्रयोग: तकनीक की कमी के बावजूद संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने जिस तरह से ‘दूरी’ का भ्रम पैदा करने के लिए लता जी से शारीरिक श्रम करवाया, वह उनकी रचनात्मकता को दर्शाता है।
- भावपूर्ण गायन: लता जी का समर्पण उनके स्वर में साफ झलकता है, जिससे यह गीत केवल एक गाना न रहकर एक अनुभव बन जाता है।
यह गीत हमें याद दिलाता है कि सच्ची कला संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि साधना और स्वाभिमान से उपजती है।
Q.42:
अब आप नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी की सहायता से लता मंगेशकर द्वारा गाया हुआ गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ सुन सकते हैं।
https://youtu.be/CF_RqQF99Iw?si=7CG_zpv8XW5Hprmi
Solution:
लता मंगेशकर जी द्वारा गाया गया गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ भारतीय संगीत के इतिहास की एक ऐसी कृति है, जो आज भी हर भारतीय की आँखों को नम कर देती है। सन् 1962 के युद्ध के बाद जब लता जी ने यह गीत तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में गाया, तो पूरा वातावरण देशप्रेम और करुणा से भर गया था।
इस गीत की कुछ मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- शहीदों को श्रद्धांजलि: कवि प्रदीप द्वारा लिखे गए बोल उन सैनिकों के बलिदान को याद दिलाते हैं जिन्होंने बर्फीली पहाड़ियों पर देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
- भावपूर्ण गायन: लता जी की आवाज़ में जो दर्द और आत्मीयता है, वह इस गीत को केवल एक देशभक्ति गीत नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय प्रार्थना बना देती है।
- सादगी और प्रभाव: जिस प्रकार लता जी ने अपने साक्षात्कार में सादगी और स्वाभिमान पर बल दिया, वही गरिमा इस गीत की प्रस्तुति में भी झलकती है।
यह गीत हमें सिखाता है कि कला में वह शक्ति है जो पूरे देश को एक सूत्र में पिरो सकती है और सीमाओं पर खड़े प्रहरियों के प्रति हमारे मन में सम्मान जगा सकती है। इस गीत को सुनना स्वयं में एक भावुक और गौरवपूर्ण अनुभव है।
NCERT Solutions Class 9 Hindi Ganga
- दो बैलों की कथा
- क्या लिखूँ
- संवादहीन
- ऐसी भी बातें होती हैं
- आखिरी चट्टान तक
- रीढ़ की हड्डी
- मैं और मेरा देश
- रैदास के पद
- राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
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- झाँसी की रानी
- घर की याद
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