आखिरी चट्टान तक- NCERT Solutions Class 9 Hindi Ganga includes all the questions with solution given in NCERT Class 9 हिंदी (गंगा) textbook.
NCERT Solutions Class 9
English Kaveri Hindi Ganga Sanskrit Sharada Maths Ganita Manjari Science Exploration Social Understanding Societyआखिरी चट्टान तक – NCERT Solutions
Q.1:
“आखिरी चट्टान” कहानी में लेखक ने सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य कहाँ से देखा?
Options:
(1) विवेकानंद चट्टान से
(2) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से ✅
(3) पश्चिमी क्षितिज से
(4) सैंड हिल से
Explanation:
लेखक पहले ‘सैंड हिल’ पर पहुँचता है, लेकिन वहाँ से उसे पूरा दृश्य स्पष्ट नहीं दिखाई देता क्योंकि एक ऊँचा टीला बीच में आ रहा था। इसलिए वह आगे बढ़ते हुए कई टीलों को पार करता है और अंततः एक ऐसे ऊँचे टीले पर पहुँचता है जहाँ से उसे पश्चिमी क्षितिज का पूरा खुला विस्तार दिखाई देता है। यही टीला अरब सागर की दिशा में था। वहीं बैठकर उसने सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य देखा, जब सूर्य धीरे-धीरे समुद्र में डूबता हुआ दिखाई देता है।
Q.2:
“मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं ही हूँ|” यह कथन लेखक की किस मनःस्थिति को दर्शाता है?
Options:
(1) मौन हो जाना
(2) विस्मित हो जाना ✅
(3) भ्रमित हो जाना
(4) आशंकित होना
Explanation:
लेखक जब समुद्र, लहरों और अनंत क्षितिज के अद्भुत दृश्य को देखता है, तो वह उसकी विशालता और सुंदरता में पूरी तरह डूब जाता है। उस समय वह अपने अस्तित्व तक को भूल जाता है और स्वयं को उस दृश्य का एक हिस्सा महसूस करता है। यह स्थिति किसी डर या भ्रम की नहीं, बल्कि आश्चर्य और अद्भुत अनुभूति की है। इसलिए यह कथन लेखक के अत्यधिक विस्मित (आश्चर्यचकित) होने की मनःस्थिति को दर्शाता है।
Q.3:
“मैंने, सिर्फ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो।” इस कथन में कौन-सा भाव व्यक्त होता है?
Options:
(1) करुणा
(2) विनम्रता
(3) आत्मीयता
(4) संतुष्टि ✅
Explanation:
लेखक कई कठिन टीलों को पार करके अंततः उस ऊँचे टीले पर पहुँचता है, जहाँ से उसे सूर्यास्त का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। वहाँ पहुँचकर उसे अपने प्रयास की सफलता का अनुभव होता है और वह गर्व व खुशी महसूस करता है। “मैंने, सिर्फ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो” कथन में उसी उपलब्धि और तृप्ति की भावना झलकती है। इसलिए यह संतुष्टि (सफलता से मिलने वाली खुशी) का भाव व्यक्त करता है।
Q.4:
“शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति” वाक्य में वर्णन है-
Options:
(1) बलखाती लहरों का
(2) सागर की व्यापकता का ✅
(3) सूर्यास्त के दृश्य का
(4) पश्चिमी क्षितिज का
Explanation:
यह वाक्य उस समय आया है जब लेखक चारों ओर फैले समुद्र को देख रहा है। उसे हर दिशा में जल ही जल दिखाई देता है और सागर की असीम विशालता तथा उसकी शक्ति का अनुभव होता है। “शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति” में समुद्र की अनंत व्यापकता और उसकी ताकत का वर्णन किया गया है। इसलिए यह सागर की व्यापकता को दर्शाता है।
Q.5:
लेखक की कन्याकुमारी की यात्रा का वर्णन पढ़कर कहा जा सकता है कि
Options:
(1) यह कन्याकुमारी के मौसम को प्रमुखता से वर्णित करता है।
(2) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है। ✅
(3) यह केवल यात्रा के रोमांच पर केंद्रित है।
(4) इसमें कन्याकुमारी का काल्पनिक वर्णन मिलता है।
Explanation:
लेखक ने अपनी यात्रा का वर्णन केवल स्थान या मौसम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसने हर दृश्य – समुद्र, लहरें, चट्टानें, सूर्योदय और सूर्यास्त-को अपनी भावनाओं और अनुभूतियों के साथ प्रस्तुत किया है। वह कहीं विस्मित होता है, कहीं डरता है, कहीं संतुष्टि महसूस करता है। इससे पाठ बहुत जीवंत और वास्तविक लगता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह यात्रा-वर्णन लेखक की गहरी अनुभूतियों से जुड़ा हुआ है, न कि केवल जानकारी या रोमांच तक सीमित।
Q.6:
यात्रियों का समूह सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए सैंड हिल की ओर बढ़ता जा रहा था लेकिन लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर कुछ देर रुकने के बाद दूसरे टीले की ओर बढ़ने लगा। उसके ऐसा करने के पीछे मूल कारण क्या था?
Solution:
लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर कुछ देर रुका, लेकिन उसे वहाँ से सूर्यास्त का पूरा और स्पष्ट दृश्य दिखाई नहीं दे रहा था। सैंड हिल के सामने एक और ऊँचा टीला था, जो अरब सागर की ओर के विस्तार को ढक रहा था। लेखक चाहता था कि वह सूर्यास्त को पूरे विस्तार के साथ, बिना किसी बाधा के देख सके। उसके मन में प्रकृति के इस अद्भुत दृश्य को पूर्ण रूप से अनुभव करने की तीव्र इच्छा थी। इसलिए वह संतुष्ट नहीं हुआ और आगे बढ़ने का निर्णय लिया। उसने कई टीलों को पार किया, भले ही उसकी टाँगें थक रही थीं, लेकिन उसका मन नहीं थका। अंततः वह एक ऐसे ऊँचे टीले पर पहुँचा, जहाँ से उसे पूरा दृश्य साफ दिखाई दिया। इस प्रकार, पूर्ण और सुंदर अनुभव की चाह ही उसके आगे बढ़ने का मुख्य कारण थी।
Q.7:
लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों के विषय में क्या-क्या बताया?
Solution:
लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों के जीवन के बारे में महत्वपूर्ण बातें बताई हैं। वह बताता है कि वहाँ लगभग आठ हजार की आबादी में चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक बेरोजगार हैं, जिनमें लगभग सौ ग्रेजुएट भी शामिल हैं। ये युवक नौकरी की तलाश में लगातार अर्जियाँ देते रहते हैं और आपस में चर्चा व बहस करते हैं। जीविका चलाने के लिए वे छोटे-मोटे काम करते हैं, जैसे फोटो-एलबम बेचना या सीपियों से बनी वस्तुएँ बेचना। लेखक ने यह भी बताया कि वे समुद्र से मिलने वाली चीज़ों, जैसे सीपियों का गूदा, खाकर अपना गुजारा करते हैं। इसके साथ ही वे दार्शनिक विषयों पर चर्चा करते हैं। इससे पता चलता है कि उनके जीवन में संघर्ष के साथ-साथ विचारशीलता भी है।
Q.8:
“अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया” इस पंक्ति में ‘प्रयत्न की सार्थकता’ से क्या अभिप्राय है?
Solution:
इस पंक्ति में ‘प्रयत्न की सार्थकता’ से अभिप्राय लेखक के उस लगातार किए गए प्रयास की सफलता से है, जिसके माध्यम से वह सही स्थान तक पहुँचना चाहता था। लेखक सैंड हिल से संतुष्ट नहीं हुआ और बेहतर दृश्य की खोज में एक के बाद एक कई टीलों को पार करता गया। रास्ता कठिन था, टाँगें थक रही थीं, फिर भी उसने हार नहीं मानी। अंततः वह एक ऐसे ऊँचे टीले पर पहुँच गया, जहाँ से उसे सूर्यास्त का पूरा और सुंदर दृश्य स्पष्ट दिखाई दिया। जब उसे अपने उद्देश्य की पूर्ति हो गई, तो उसे अपने प्रयास सफल और सार्थक लगे। इसी संतोष और उपलब्धि की भावना के कारण वह वहाँ बैठ गया, जैसे उसने कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त कर ली हो।
Q.9:
यात्रा-वृत्तांत में आए उन दृश्यों के विषय में लिखिए जिनका अनुभव लेखक के लिए बिल्कुल नया था।
Solution:
लेखक की कन्याकुमारी यात्रा में कई ऐसे दृश्य थे जो उसके लिए बिल्कुल नए और अद्भुत थे। सबसे पहले, तीन समुद्रों-अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी-का संगम और वहाँ की प्रचंड लहरों का दृश्य उसके लिए अनोखा अनुभव था। समुद्र की असीम व्यापकता और लहरों की शक्ति ने उसे गहराई से प्रभावित किया। सूर्यास्त का बदलता रंग-सोने से लाल, फिर बैंगनी और अंत में काला-भी उसने पहली बार इतनी स्पष्टता से देखा। इसके अलावा, समुद्र तट की रेत में दिखाई देने वाले अनेक अनोखे और मिश्रित रंग उसके लिए बिल्कुल नए थे, जिन्हें उसने पहले कभी नहीं देखा था। ‘विवेकानंद चट्टान’ तक नाव से पहुँचना और वहाँ का अनुभव भी उसके लिए एक नया और रोमांचक अनुभव था।
Q.10:
यात्रा-वृत्तांत से ऐसे दो अंश चुनकर लिखिए जिससे लेखक की मानसिक दृढ़ता और हार न मानने की प्रवृत्ति का पता चलता है।
Solution:
यात्रा-वृत्तांत में कई ऐसे अंश हैं जो लेखक की मानसिक दृढ़ता और हार न मानने की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। पहला अंश वह है, जब लेखक सैंड हिल से संतुष्ट नहीं होता और बेहतर दृश्य पाने के लिए एक के बाद एक कई टीलों को पार करता जाता है- “टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था।” यह वाक्य उसकी अटूट इच्छाशक्ति को स्पष्ट करता है।
दूसरा अंश तब का है, जब समुद्र का पानी बढ़ने लगता है और खतरे की स्थिति बन जाती है, फिर भी लेखक घबराकर रुकता नहीं, बल्कि साहस जुटाकर आगे बढ़ता है- “मैं दौड़ने लगा… एक ऊँची लहर से बचकर इस तरह दौड़ा जैसे सचमुच वह मुझे अपनी लपेट में लेने आ रही हो।” ये अंश उसकी हिम्मत और दृढ़ निश्चय को उजागर करते हैं।
Q.11:
मोहन राकेश का ‘आखिरी चट्टान तक’ यात्रा-वृत्तांत केवल स्थान-चित्रण नहीं है बल्कि इसमें प्रकृति का सजीव रूपांकन, मानव-जीवन और समाज की झलक तथा आत्मानुभूति का गहरा समन्वय मिलता है।
नीचे यात्रा-वृत्तांत के प्रमुख तत्वों/विशेषताओं को कुछ प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से दर्शाया गया है। इन्हें पढ़कर यात्रा-वृत्तांत की रचना-प्रक्रिया को समझने का प्रयास कीजिए। अपनी किसी यात्रा को इन बिंदुओं के माध्यम से समझाइए।
Solution:
मेरी यात्रा का वृत्तांत (उदाहरण: मनाली की यात्रा)
नीचे दिए गए बिंदुओं के आधार पर मेरी यात्रा का विवरण इस प्रकार है:
1. दृश्य-वर्णन
- पहाड़ और वादियाँ: चारों ओर बर्फ से ढकी ऊँची पर्वत चोटियाँ और बादलों का लुका-छिपी का खेल दिखाई दे रहा था।
- नदी और झरने: ब्यास नदी की कल-कल करती आवाज़ और पत्थरों से टकराते पानी की लहरें बहुत सुंदर लग रही थीं।
- प्रकृति के रंग: देवदार के हरे-भरे पेड़, नीला आकाश और सूर्यास्त के समय पहाड़ों पर बिखरती सुनहरी रोशनी का जीवंत दृश्य अद्भुत था।
2. आत्मानुभूति व भावनाएँ
- विस्मय और रोमांच: पहाड़ों की विशालता को देखकर मन विस्मय से भर गया और ऊँची ढलानों पर ट्रेकिंग करना रोमांचक रहा।
- प्रकृति से संवाद: शहर की भीड़भाड़ से दूर, पहाड़ों की शांति के बीच ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति मुझसे बातें कर रही हो।
- अस्तित्व का बोध: उन विशाल पहाड़ों के सामने खड़े होकर अपनी लघुता (छोटे होने) का एहसास हुआ।
3. सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
- स्थानीय लोग: वहाँ के लोगों का पहनावा और उनकी सरल जीवनशैली बहुत प्रभावित करने वाली थी।
- धार्मिक परंपराएँ: हिडिम्बा देवी के मंदिर में दर्शन करना और वहाँ की वास्तुकला को देखना एक सांस्कृतिक अनुभव था।
4. जीवन-दर्शन
- शक्ति और विस्तार: पहाड़ों की अडिगता यह सिखाती है कि जीवन में आने वाले तूफानों का सामना कैसे किया जाए।
- उदासी और शांति: निर्जन रास्तों पर चलते हुए मन में एक सुखद उदासी और आत्मिक शांति का भाव उमड़ रहा था।
5. शैलीगत विशेषताएँ
- प्रवाहपूर्ण अनुभव: यात्रा का हर पल एक चित्र की तरह आँखों के सामने तैर रहा था।
- रूपक और उपमा: पहाड़ों को देखकर लग रहा था जैसे वे पृथ्वी के रक्षक बनकर खड़े हों।
6. रोमांच व संघर्ष
- चुनौतियाँ: रात के समय घने अँधेरे में होटल की ओर लौटते वक्त रास्ता भटकने का थोड़ा डर महसूस हुआ।
- सुरक्षित वापसी: अचानक हुई बर्फबारी और ठंड के बीच सुरक्षित वापस पहुँचने की चिंता और संघर्ष ने यात्रा को यादगार बना दिया।
Q.12:
संसार में बहुत से लोगों ने लंबी-लंबी यात्राएँ की हैं और अपनी यात्रा से अर्जित ज्ञान और अनुभव से समाज को समृद्ध किया है। पुस्तकालय एवं शिक्षक की सहायता से कुछ महत्वपूर्ण यात्रा-वृत्तांत और उनके लेखकों के विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए और लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक संकेत नीचे दिया गया है।
| यात्रा-वृत्तांत | स्थान | रचनाकार |
| किन्नर देश में | हिमाचल प्रदेश में स्थित किन्नौर | राहुल सांकृत्यायन |
Solution:
महत्वपूर्ण यात्रा-वृत्तांत और उनके रचनाकार
संसार के विभिन्न हिस्सों की यात्रा कर लेखकों ने अपने अनुभवों से साहित्य को समृद्ध किया है। यहाँ कुछ प्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांतों की सूची दी गई है:
| यात्रा-वृत्तांत | स्थान | रचनाकार |
| किन्नर देश में | हिमाचल प्रदेश में स्थित किन्नौर | राहुल सांकृत्यायन |
| अरे यायावर रहेगा याद | एक भारतीय यात्री की स्वदेश यात्रा | अश्रेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) |
| पैरों में पंख बाँधकर | विभिन्न देशों की यात्रा का वर्णन | रामवृक्ष बेनीपुरी |
| रुस में पच्चीस मास | सोवियत रुस की यात्रा | राहुल सांकृत्यायन |
| एक बूँद सहसा उछली | समुद्री यात्रा और यूरोप के अनुभव | अज्ञेय |
| आखिरी चट्टान तक | कन्याकुमारी (भारत का दक्षिणी छोर) | मोहन राकेश |
यात्रा-वृत्तांतों का महत्व
- ज्ञान का विस्तार: यात्रा-वृत्तांत हमें उन जगहों की भौगोलिक स्थिति और जन-जीवन की जानकारी देते हैं जहाँ हम स्वयं नहीं जा पाए हैं।
- सांस्कृतिक परिचय: इनसे हमें अन्य क्षेत्रों की परंपराओं, खान-पान और स्थानीय समस्याओं (जैसे कन्याकुमारी के शिक्षित बेरोजगारों की समस्या) का पता चलता है।
- मानवीय अनुभव: लेखक अपनी यात्रा के दौरान आने वाली चुनौतियों और रोमांच को साझा करते हैं, जो पाठकों को प्रेरित करते हैं।
Q.13:
भारत के समुद्री तट पर स्थित अन्य राज्यों के नाम तथा उनकी अवस्थिति को भारत के मानचित्र पर चिह्नित कीजिए।
Solution:
भारत की तटरेखा लगभग 7,516 किलोमीटर लंबी है, जो नौ राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों को स्पर्श करती है। मानचित्र के अनुसार इनकी अवस्थिति इस प्रकार है:
1. पश्चिमी तट (अरब सागर):
- गुजरात: यह सबसे लंबी तटरेखा वाला राज्य है।
- महाराष्ट्र और गोवा: कोंकण तट पर स्थित हैं।
- कर्नाटक: मालाबार तट के उत्तरी भाग में स्थित है।
- केरल: दक्षिण-पश्चिमी छोर पर स्थित है।
2. पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी):
- तमिलनाडु: यहाँ कन्याकुमारी स्थित है, जहाँ अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी का संगम होता है।
- आंध्र प्रदेश: कोरोमंडल तट का बड़ा हिस्सा यहाँ आता है।
- ओड़िशा: यहाँ प्रसिद्ध चिल्का झील और जगन्नाथ पुरी का तट है।
- पश्चिम बंगाल: यह गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा और सुंदरवन के लिए प्रसिद्ध है।
सांस्कृतिक व भौगोलिक महत्व: ये तटीय राज्य न केवल पर्यटन (जैसे कन्याकुमारी का सूर्योदय और सूर्यास्त) के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि व्यापार और मछली पालन जैसे उद्योगों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। मोहन राकेश जी के यात्रा-वृत्तांत में कन्याकुमारी की जिस ‘आखिरी चट्टान’ का वर्णन है, वह इन्हीं तटीय सीमाओं का अंतिम बिंदु है।
Q.14:
यात्रा करना सभी को अच्छा लगता है। आपके मन में भी कुछ जगहों को देखने की इच्छा अवश्य हुई होगी। अपनी पसंद की उन जगहों की सूची नीचे दिए गए शीर्षकों के अनुसार बनाइए।
| पर्यटन स्थल | राज्य जहाँ वह स्थित है | पर्वतीय/समुद्री/ मैदानी/अन्य क्षेत्र | जलवायु | घूमने का अनुकूल समय |
Solution:
मेरी पसंद के पर्यटन स्थलों की सूची
| पर्यटन स्थल | राज्य जहाँ वह स्थित है | पर्वतीय/समुद्री/मैदानी/ अन्य क्षेत्र | जलवायु | घूमने का अनुकूल समय |
| लेह-लद्दाख | लद्दाख (केंद्र शासित प्रदेश) | पर्वतीय क्षेत्र | अत्यधिक ठंडी और शुष्क | मई से सितंबर |
| कन्याकुमारी | तमिलनाडु | समुद्री क्षेत्र | उष्णकटिबंधीय (नम और गर्म) © | अक्टूबर से मार्च |
| जैसलमेर | राजस्थान | मरुस्थलीय (अन्य) | गर्म और शुष्क | नवंबर से फरवरी |
| मनाली | हिमाचल प्रदेश | पर्वतीय क्षेत्र | ठंडी और सुखद | मार्च से जून और दिसंबर (बर्फ के लिए) |
| वाराणसी | उत्तर प्रदेश | मैदानी क्षेत्र | मध्यम (गर्म ग्रीष्म और ठंडी शीत) | अक्टूबर से मार्च |
तालिका का संक्षिप्त विश्लेषण
- पर्वतीय क्षेत्र: यहाँ की जलवायु ठंडी होती है, जो गर्मी से राहत पाने के लिए उपयुक्त है।
- समुद्री क्षेत्र (जैसे कन्याकुमारी): यहाँ की जलवायु में नमी अधिक होती है और सूर्योदय व सूर्यास्त का दृश्य मनोहारी होता है।
- घूमने का समय: किसी भी स्थान की जलवायु वहां जाने के लिए सबसे अनुकूल समय निर्धारित करती है, जैसे मैदानी इलाकों में सर्दियों का समय सबसे अच्छा होता है।
Q.15:
कन्याकुमारी की भौगोलिक स्थिति, परिवेश, महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल एवं जन-जीवन का वर्णन करते हुए बताइए कि वहाँ की स्थिति आपके राज्य अथवा शहर/गाँव से किस प्रकार भिन्न है?
Solution:
पाठ के आधार पर कन्याकुमारी की स्थिति और जन-जीवन का वर्णन यहाँ दिया गया है:
भौगोलिक स्थिति और परिवेश: कन्याकुमारी भारत के तमिलनाडु राज्य में स्थित सुदूर दक्षिणतम तटीय शहर है। यह स्थान अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी का संगम स्थल है। यहाँ का परिवेश प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है, जहाँ सूर्योदय और सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। यहाँ की रेत कई अनाम रंगों (सुरमई, लाल, पीली) का अद्भुत मिश्रण है।
महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल: प्रमुख स्थलों में विवेकानन्द स्मारक चट्टान, कन्याकुमारी मंदिर और ‘सैंड हिल’ (रेत का टीला) शामिल हैं। विवेकानन्द चट्टान पर कभी स्वामी विवेकानन्द ने समाधि लगाई थी।
जन-जीवन: यहाँ का जन-जीवन समुद्र पर निर्भर है। मल्लाह रबर के पेड़ों के तनों से बनी नावों का उपयोग करते हैं। यहाँ शिक्षित बेरोजगारी की समस्या भी है; ग्रेजुएट युवक फोटो एल्बम या शंख-मालाएँ बेचकर जीवन यापन करते हैं।
मेरे शहर/गाँव से भिन्नता: यदि आप उत्तर भारत के मैदानी या पर्वतीय क्षेत्र से हैं, तो कन्याकुमारी उससे पूर्णतः भिन्न है। मेरे क्षेत्र में समुद्र के स्थान पर खेत या पहाड़ हैं और जलवायु शुष्क है, जबकि कन्याकुमारी में उष्णकटिबंधीय नम जलवायु है। वहाँ की रंगीन रेत और तीन सागरों का मिलन हमारे यहाँ के भू-परिवेश से बिल्कुल अलग और अद्वितीय है।
Q.16:
इस यात्रा-वृत्तांत में कन्याकुमारी में स्थित चट्टान को आखिरी चट्टान कहा गया है। पुस्तकालय या अन्य स्रोतों तथा समाज विज्ञान के अपने शिक्षक से बातचीत करके पता लगाइए कि वर्तमान समय में भारत का अंतिम छोर (दक्षिणतम बिंदु) किसे माना जाता है। उस स्थान के विषय में लिखिए।
Solution:
भौगोलिक तथ्यों के आधार पर इस प्रश्न का उत्तर निम्नलिखित है:
भारत का दक्षिणतम बिंदु: लेखक मोहन राकेश ने अपने यात्रा-वृत्तांत में कन्याकुमारी की जिस चट्टान का वर्णन किया है, वह भारत की मुख्य भूमि (Mainland) का अंतिम छोर है। परंतु, यदि संपूर्ण भारतीय संघ की बात की जाए, तो भारत का सबसे अंतिम दक्षिणतम बिंदु ‘इंदिरा पॉइंट’ (Indira Point) माना जाता है।
इंदिरा पॉइंट के विषय में जानकारी:
- अवस्थिति: यह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ‘ग्रेट निकोबार’ द्वीप पर स्थित है।
- ऐतिहासिक नाम: इसे पहले ‘पिगमैलियन पॉइंट’ के नाम से जाना जाता था, जिसे बाद में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सम्मान में बदला गया।
- भौगोलिक महत्व: यह बिंदु भूमध्य रेखा (Equator) के बहुत करीब स्थित है।
- 2004 की सुनामी: वर्ष 2004 में आई भीषण सुनामी के दौरान इस स्थान का एक बड़ा हिस्सा समुद्र में जलमग्न हो गया था।
निष्कर्ष: जहाँ कन्याकुमारी की ‘आखिरी चट्टान’ तीन सागरों (अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर) के संगम का केंद्र है, वहीं इंदिरा पॉइंट भौगोलिक रूप से भारत की सीमा का अंतिम विस्तार है।
Q.17:
इंटरनेट या अन्य किन्हीं माध्यमों से पता लगाइए कि आखिरी चट्टान में वर्णित कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक चट्टान के स्वरूप में किस प्रकार का विस्तार हुआ है?
Solution:
पाठ में वर्णित कन्याकुमारी की वह ‘आखिरी चट्टान’, जहाँ कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगाई थी, आज एक भव्य स्मारक के रूप में विकसित हो चुकी है। पिछले कुछ दशकों में इस क्षेत्र के स्वरूप में हुए प्रमुख विस्तार निम्नलिखित हैं:
- तिरुवल्लुवर की विशाल प्रतिमा: विवेकानंद रॉक मेमोरियल के ठीक बगल में एक छोटी चट्टान पर महान तमिल संत और कवि तिरुवल्लुवर की 133 फीट ऊँची विशाल पत्थर की प्रतिमा स्थापित की गई है। यह प्रतिमा आज कन्याकुमारी की पहचान का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई है और पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है।
- विवेकानंद रॉक मेमोरियल का विकास: लेखक मोहन राकेश ने जिस चट्टान को “समाधिस्थ-सी” और “पानी की मार सहती हुई” देखा था, वहाँ अब एक सुव्यवस्थित स्मारक भवन और ध्यान मंडप (Meditation Hall) बना हुआ है। यह स्थल अब आध्यात्मिक ऊर्जा और आधुनिक वास्तुकला का संगम है।
- पर्यटक सुविधाएँ: अब तट से चट्टान तक पहुँचने के लिए केवल मछुआ नावों (कट्टुमरन) पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, बल्कि आधुनिक नौका सेवाएँ (Ferry Services) उपलब्ध हैं। घाटों का सुंदरीकरण किया गया है और पर्यटकों के बैठने व सुरक्षा के विशेष प्रबंध किए गए हैं।
यह विस्तार इस ‘आखिरी चट्टान’ की भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्ता को और अधिक गौरवशाली बनाता है।
Q.18:
किसी भी स्थानीय शिल्पकार से बात करके निम्नलिखित बिंदुओं पर जानकारी संगृहीत कीजिए। यह कार्य दो-दो के जोड़े में कीजिए-
- शिल्प का नाम
- यह कार्य कब से कर रहे हैं?
- इसका प्रशिक्षण कहाँ से लिया?
- शिल्प निर्माण में घर की महिलाओं की साझेदारी
- प्रयुक्त सामग्री, तकनीक, लागत और विपणन
- औपचारिक संस्थागत प्रशिक्षण
Solution:
स्थानीय शिल्पकार से साक्षात्कार का विवरण:
- शिल्प का नाम: मिट्टी के बर्तन और सजावटी हस्तशिल्प का निर्माण।
- कार्य की अवधि: शिल्पकार यह कार्य पिछले 25 वर्षों से अपने पैतृक व्यवसाय के रूप में कर रहे हैं।
- प्रशिक्षण: उन्होंने इसका हुनर अपने पिता और दादाजी से विरासत में सीखा है, जो पीढ़ियों से इस कार्य में संलग्न हैं।
- महिलाओं की साझेदारी: घर की महिलाएँ मिट्टी तैयार करने, बर्तनों पर सुंदर नक्काशी करने, उन्हें रंगों से सजाने और सुखाने के कार्यों में महत्वपूर्ण साझेदारी निभाती हैं।
- तकनीक और विपणन: इसमें चाक (Wheel), मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। लागत कम है परंतु शारीरिक श्रम अधिक है। विपणन (बेचना) स्थानीय मेलों, हाट-बाजारों और अब डिजिटल माध्यमों से भी किया जाता है।
- औपचारिक प्रशिक्षण: शिल्पकार ने कोई औपचारिक संस्थागत डिग्री नहीं ली है, बल्कि पारंपरिक पारिवारिक पद्धति से ही निपुणता प्राप्त की है।
यह हस्तशिल्प न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखता है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी प्रदान करता है।
Q.19:
डिजिटल खरीददारी और ई-वाणिज्य कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने में किस प्रकार उपयोगी है?
Solution:
विषय के संदर्भ में, डिजिटल खरीदारी और ई-वाणिज्य (E-commerce) कुटीर उद्योगों के लिए निम्नलिखित प्रकार से उपयोगी हैं:
- बाज़ार का विस्तार: डिजिटल माध्यमों की सहायता से कुटीर उद्योग और स्थानीय शिल्पकार अपने उत्पादों को केवल स्थानीय बाज़ारों तक सीमित न रखकर देश-विदेश के ग्राहकों तक पहुँचा सकते हैं।
- बिचौलियों की समाप्ति: ई-वाणिज्य प्लेटफॉर्म शिल्पकारों को सीधे ग्राहकों (Direct-to-Consumer) से जोड़ते हैं। इससे बिचौलियों का कमीशन बचता है और शिल्पकारों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त होता है।
- कम लागत में विपणन: सोशल मीडिया और ऑनलाइन वेबसाइटों के माध्यम से बहुत कम लागत में उत्पादों का प्रचार-प्रसार और विज्ञापन किया जा सकता है।
- 24/7 उपलब्धता: डिजिटल स्टोर चौबीसों घंटे खुले रहते हैं, जिससे ग्राहक अपनी सुविधा अनुसार कभी भी हस्तशिल्प की खरीदारी कर सकते हैं।
- डिजिटल भुगतान: ऑनलाइन बैंकिंग और यूपीआई (UPI) जैसी सुविधाओं ने भुगतान की प्रक्रिया को सुरक्षित और सरल बना दिया है, जिससे छोटे व्यापारियों का विश्वास बढ़ा है।
संक्षेप में, डिजिटल क्रांति ने कन्याकुमारी जैसे सुदूर क्षेत्रों के उन स्थानीय नवयुवकों और युवतियों के लिए स्वरोजगार के नए द्वार खोले हैं जो पारंपरिक रूप से शंख-मालाएँ और हस्तशिल्प बेचकर अपना जीवन यापन करते हैं।
Q.20:
हस्तशिल्प कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी इकट्ठा कीजिए और अपनी कक्षा में उस पर चर्चा कीजिए।
Solution:
विषय के अंतर्गत, भारतीय हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने और स्थानीय कारीगरों को सशक्त बनाने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रमुख प्रयास निम्नलिखित हैं:
- पीएम विश्वकर्मा योजना: इस योजना के माध्यम से पारंपरिक शिल्पकारों (जैसे कुम्हार, बुनकर, और लोहार) को कम ब्याज पर ऋण, कौशल प्रशिक्षण और आधुनिक टूलकिट प्रदान की जाती है।
- ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP): सरकार की इस पहल का उद्देश्य प्रत्येक जिले के एक विशिष्ट हस्तशिल्प उत्पाद की पहचान करना और उसे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रांड के रूप में स्थापित करना है।
- हस्तशिल्प हाट और मेलों का आयोजन: दिल्ली हाट, सूरजकुंड मेला और ‘हुनर हाट’ जैसे मंचों के माध्यम से सरकार स्थानीय कारीगरों को सीधे ग्राहकों से मिलने और अपने उत्पाद बेचने का अवसर प्रदान करती है।
- डिजिटल इंडिया और ई-कॉमर्स सहयोग: सरकार ने ‘GeM’ (Government e-Marketplace) पोर्टल और अन्य निजी ई-कॉमर्स कंपनियों के साथ समझौता किया है ताकि कन्याकुमारी जैसे दूर-दराज के क्षेत्रों की शंख-मालाओं और हस्तशिल्प को ऑनलाइन बेचा जा सके।
- शिल्प ग्राम की स्थापना: देश के विभिन्न पर्यटन स्थलों पर ‘शिल्प ग्राम’ विकसित किए गए हैं जहाँ पर्यटक कारीगरों को जीवंत कला प्रदर्शन करते देख सकते हैं और उनसे सीधे उत्पाद खरीद सकते हैं।
- कौशल विकास प्रशिक्षण: विभिन्न सरकारी संस्थानों द्वारा शिल्पकारों को डिजाइन में आधुनिक बदलाव लाने और वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पाद तैयार करने के लिए औपचारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
कक्षा में चर्चा का बिंदु: हस्तशिल्प को बढ़ावा देना न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखता है, बल्कि यह कन्याकुमारी के उन शिक्षित बेरोजगार युवाओं के लिए भी सम्मानजनक स्वरोजगार का मार्ग प्रशस्त करता है जिनका वर्णन लेखक मोहन राकेश ने किया है।
Q.21:
आपकी कक्षा में कुछ विशेष आवश्यकता वाले साथी भी होंगे जिन्हें अपने दैनिक जीवन में अनेक तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता होगा।
- ऐसे साथियों को अगर किसी यात्रा पर जाना हो तो उनके समक्ष किस प्रकार की चुनौतियाँ आ सकती हैं?
- उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कुछ ऐसे सुझाव दीजिए जो उनकी यात्रा को सहज बनाने में उपयोगी हों।
- अपने द्वारा दिए गए सुझावों पर विद्यालय के विशेष शिक्षा शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए और समझिए कि आपके द्वारा सुझाए गए उपाय कितने प्रभावी हैं तथा उनमें और क्या बदलाव किए जा सकते हैं?
- प्राप्त सुझावों के विषय में कक्षा के विशेष आवश्यकता वाले साथियों से भी चर्चा कीजिए और उनकी राय जानने का प्रयास कीजिए।
Solution:
विशेष आवश्यकता वाले साथियों (दिव्यांगों) की यात्रा को सुखद बनाने हेतु उत्तर निम्नलिखित है:
- यात्रा के दौरान आने वाली चुनौतियाँ
विशेष आवश्यकता वाले साथियों को यात्रा में कई भौतिक और सामाजिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है:- अभिगम्यता (Accessibility): रेलवे स्टेशनों, बसों और पर्यटन स्थलों (जैसे कन्याकुमारी की ऊबड़-खाबड़ चट्टानों) पर रैंप या लिफ्ट की कमी होना।
- परिवहन: सार्वजनिक वाहनों में व्हीलचेयर के लिए पर्याप्त स्थान न होना।
- सूचना का अभाव: दृष्टिबाधित साथियों के लिए ब्रेल लिपि में संकेतकों या श्रव्य (audio) निर्देशों की अनुपलब्धता।
- सुरक्षा: भीड़भाड़ वाले स्थानों पर चोट लगने या खो जाने का भय।
- यात्रा को सहज बनाने के सुझाव
- यूनिवर्सल डिजाइन: सभी पर्यटन स्थलों और परिवहन साधनों में अनिवार्य रूप से रैंप, चौड़े दरवाजे और स्पर्शनीय (tactile) रास्तों का निर्माण किया जाए।
- सहायक तकनीक: यात्रा संबंधी जानकारी के लिए विशेष ऐप्स और श्रव्य गाइड उपलब्ध कराए जाएं।
- संवेदनशील कर्मचारी: होटल और परिवहन कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे इन साथियों की जरूरतों को समझ सकें।
- पूर्व नियोजन: यात्रा से पहले गंतव्य की सुगमता की जाँच करना और चिकित्सा सहायता का प्रबंध रखना।
- (iii) एवं (iv) शिक्षक और साथियों के साथ चर्चा
विद्यालय के विशेष शिक्षा शिक्षक के साथ चर्चा करने पर यह स्पष्ट होता है कि केवल भौतिक संसाधन ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज का संवेदनशील व्यवहार सबसे अधिक प्रभावी है। विशेष आवश्यकता वाले साथियों से बात करने पर पता चलता है कि वे सहानुभूति नहीं, बल्कि समान अवसर और स्वतंत्रता चाहते हैं। उनके सुझावों के आधार पर यात्रा योजनाओं में लचीलापन लाना और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना अनिवार्य है।
Q.22:
क्या आपने कभी सूर्योदय और सूर्यास्त के समय का दृश्य देखा है? अगर नहीं तो एक दिन सुबह जल्दी उठकर उगते सूरज की लालिमा को देखिए और अस्त होते सूर्य के साथ शाम का भी आनंद लीजिए। अब इन दोनों दृश्यों की तुलना करते हुए अपने अनुभव का वर्णन कीजिए।
Solution:
मोहन राकेश के अनुभवों और प्रकृति के सामान्य अवलोकन के आधार पर सूर्योदय और सूर्यास्त की तुलनात्मक अनुभूति निम्नलिखित है:
सूर्योदय का अनुभव: सूर्योदय नई आशा और ऊर्जा का प्रतीक है। जब सूर्य उदित होता है, तो आकाश में धीरे-धीरे लालिमा फैलती है और अँधेरा छँटने लगता है। कन्याकुमारी के घाट पर लोग सूर्य को अर्घ्य देकर दिन की शुरुआत करते हैं। इस समय की किरणें कोमल होती हैं और वातावरण में एक पवित्र शांति व जीवंतता महसूस होती है।
सूर्यास्त का अनुभव: सूर्यास्त का दृश्य विदाई की एक सुखद उदासी लेकर आता है। लेखक ने देखा कि सूर्यास्त के समय सूर्य का गोला पानी की सतह को छूते ही ‘सोना’ बिखेर देता है, जो देखते ही देखते लहू जैसा लाल और फिर बैंगनी होकर काला पड़ जाता है। यह दृश्य ‘शक्ति के विस्तार’ का अनुभव कराता है। जहाँ सूर्योदय प्रकाश की ओर ले जाता है, वहीं सूर्यास्त धीरे-धीरे स्याही (अँधेरे) में डूबकर विस्मय और आत्म-चिंतन की ओर ले जाता है।
निष्कर्ष: सूर्योदय जागृति और क्रियाशीलता का स्वर है, जबकि सूर्यास्त प्रकृति की भव्यता और क्षणभंगुरता का दर्शन है। दोनों ही दृश्य अपनी रंगत और भावनाओं में अद्वितीय हैं।
Q.23:
विधा से संवाद के अंतर्गत आपने दिए गए बिंदुओं के माध्यम से यात्रा-वृत्तांत के प्रमुख तत्वों के विषय में जाना और समझा। इन तत्वों को ध्यान में रखकर आप भी अपने घूमे हुए किसी प्रिय स्थान के अनुभवों पर एक यात्रा-संस्मरण लिखिए।
Solution:
पाठ में वर्णित यात्रा-वृत्तांत के प्रमुख तत्वों-दृश्य-वर्णन, आत्मानुभूति और रोमांच को ध्यान में रखकर मेरा यात्रा-संस्मरण इस प्रकार है:
ऋषिकेश: गंगा और पहाड़ों का संगम
पिछली गर्मियों में मुझे ऋषिकेश जाने का अवसर मिला। वहाँ सुबह का दृश्य-वर्णन अत्यंत मनोहारी था; पहाड़ों की ओट से निकलता सूरज गंगा की लहरों पर चांदी बिखेर रहा था। लक्ष्मण झूला पर चलते समय नीचे बहती गंगा का वेग देखकर मन में विस्मय और रोमांच भर गया।
शाम को गंगा आरती के समय वातावरण शंख और घंटियों की ध्वनि से गूँज उठा। उस समय एक गहरी आत्मानुभूति हुई, मानो मैं स्वयं को प्रकृति और आध्यात्मिकता के बहुत करीब पा रहा हूँ। रात के समय नदी किनारे बैठकर लहरों की आवाज़ सुनना मेरे लिए शांति और आत्म-संवेदना का क्षण था। यात्रा के दौरान पहाड़ों के घुमावदार रास्तों पर चलना एक संघर्षपूर्ण किंतु आनंदमयी अनुभव था। यह यात्रा मेरे मन पर एक अमिट छाप छोड़ गई।
Q.24:
‘यात्राएँ हमें समृद्ध करती हैं’ विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा आयोजित कीजिए।
Solution:
‘यात्राएँ हमें समृद्ध करती हैं’ विषय पर कक्षा में आयोजित परिचर्चा का सारांश निम्नलिखित है:
परिचर्चा के मुख्य बिंदु:
- ज्ञान और अनुभव का विस्तार: यात्राएँ हमें किताबों से परे व्यावहारिक ज्ञान देती हैं। लेखक मोहन राकेश ने कन्याकुमारी की यात्रा के दौरान न केवल भौगोलिक सुंदरता को देखा, बल्कि वहाँ की बेरोजगारी और स्थानीय समस्याओं से भी साक्षात्कार किया।
- सांस्कृतिक विविधता की समझ: यात्रा के दौरान हम विभिन्न क्षेत्रों की परंपराओं, खान-पान और जीवनशैली को समझते हैं, जिससे हमारा दृष्टिकोण व्यापक होता है।
- आत्म-खोज और संवेदनशीलता: प्राकृतिक दृश्यों के बीच मनुष्य को अपने अस्तित्व का बोध होता है। कन्याकुमारी में लेखक ने ‘शक्ति के विस्तार’ को महसूस किया, जिससे उनके मन में रोमांच और आत्मिक शांति के भाव जागे।
- चुनौतियों से लड़ने का कौशल: यात्रा के दौरान आने वाली अप्रत्याशित बाधाएँ, जैसे अँधेरे में भटकने का भय या लहरों से बचाव, व्यक्ति में साहस और तुरंत निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती हैं।
निष्कर्ष: परिचर्चा का निष्कर्ष यह है कि यात्राएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये हमें मानसिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से अधिक परिपक्व और समृद्ध बनाती हैं।
Q.25:
“एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई तो सहसा मुझे खतरे का एहसास हुआ।”
यात्रा के दौरान कई बार ऐसी अप्रत्याशित चुनौतियाँ सामने आ जाती हैं। ऐसी किसी स्थिति का सामना करने के लिए व्यक्ति में किन गुणों का होना आवश्यक है? अपने सहपाठियों के साथ मिलकर इस विषय पर चर्चा कीजिए।
Solution:
मोहन राकेश के यात्रा-वृत्तांत ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक जब समुद्र तट पर अँधेरे और बढ़ती लहरों के बीच अकेला रह जाता है, तो वह क्षण उसके लिए एक बड़ी अप्रत्याशित चुनौती बन जाता है। ऐसी विषम स्थितियों का सामना करने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित गुणों का होना अत्यंत आवश्यक है:
- धैर्य और मानसिक दृढ़ता: खतरे के समय घबराने के बजाय मन को शांत रखना सबसे महत्वपूर्ण है। लेखक ने भी अँधेरे में रास्ता भटकने के भय के बावजूद अपना धैर्य नहीं खोया।
- त्वरित निर्णय क्षमता (Quick Decision Making): कठिन परिस्थितियों में सोचने के लिए अधिक समय नहीं होता। लेखक ने तुरंत निर्णय लिया कि वह रेत पर बैठकर नीचे की ओर फिसल जाएगा, जो उस समय सबसे सुरक्षित विकल्प था।
- साहस और आत्मविश्वास: लहरों के शोर और निर्जन स्थान के बीच स्वयं पर विश्वास रखना जरूरी है। आत्मविश्वास ही व्यक्ति को चुनौतियों से लड़ने की शक्ति देता है।
- सतर्कता और सावधानी: “एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई” वाला अनुभव हमें सिखाता है कि प्रकृति के बीच रहते हुए हमें हर पल सतर्क रहना चाहिए।
- अनुकूलनशीलता (Adaptability): परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेना और उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग करना एक कुशल यात्री की पहचान है।
निष्कर्ष: चर्चा का सार यह है कि यात्राएँ हमें केवल आनंद नहीं देतीं, बल्कि विपरीत समय में हमारे चरित्र और विवेक की परीक्षा भी लेती हैं। इन गुणों के माध्यम से ही हम किसी भी अप्रत्याशित संकट से सुरक्षित बाहर निकल सकते हैं।
Q.26:
यदि आपके पास भी कोई ऐसा अनुभव हो तो उसे अपने सहपाठियों के साथ साझा कीजिए।
Solution:
लेखक मोहन राकेश के अनुभव की तरह, मुझे भी अपनी एक पहाड़ी यात्रा के दौरान इसी प्रकार की अप्रत्याशित चुनौती का सामना करना पड़ा था, जिसे मैंने अपने सहपाठियों के साथ साझा किया।
मेरा अनुभव: घने कोहरे के बीच ट्रेकिंग
पिछले वर्ष जब मैं मनाली में जोगिनी झरने की ओर ट्रेकिंग कर रहा था, तब अचानक मौसम बदल गया और घना कोहरा छा गया। जैसे मोहन राकेश को लहरों के पास खतरे का एहसास हुआ, वैसे ही मुझे भी अचानक रास्ता दिखाई देना बंद होने पर भय का अनुभव हुआ। मेरे साथी मुझसे थोड़े आगे निकल गए थे और मैं बिल्कुल अकेला रह गया था।
ऐसी स्थिति में मैंने निम्नलिखित गुणों का प्रयोग किया:
- धैर्य: घबराने के बजाय मैंने एक जगह खड़े होकर गहरी साँस ली और अपने आस-पास के शोर को सुनने की कोशिश की।
- सतर्कता: मुझे पता था कि पहाड़ों पर गलत कदम उठाना जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए मैंने बिना रास्ता देखे आगे बढ़ना उचित नहीं समझा।
- साधन का उपयोग: मैंने तुरंत अपनी सीटी का उपयोग किया, जो मैंने आपातकाल के लिए पास रखी थी।
अंततः, मेरी सीटी की आवाज़ सुनकर मेरे साथी और गाइड वापस आए और मुझे सुरक्षित साथ ले गए। इस घटना ने मुझे सिखाया कि यात्रा में सावधानी और त्वरित विवेक ही हमारे सबसे बड़े रक्षक होते हैं।
Q.27:
“समुद्र में पानी बढ़ रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।”
उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित पद ‘धीरे-धीरे’ कम होना क्रिया की विशेषता बता रहा है। यहाँ कम होने की क्रिया धीमी गति से हो रही है।
जिस प्रकार संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द ‘विशेषण’ कहलाते हैं, उसी प्रकार क्रिया की विशेषता बताने वाले शब्द ‘क्रिया-विशेषण’ कहलाते हैं। इस वाक्य में ‘धीरे-धीरे’ पद व्याकरणिक दृष्टि से क्रिया-विशेषण है।
नीचे दिए गए वाक्यों को ध्यानपूर्वक पढ़कर उनमें क्रिया-विशेषण पदों की पहचान कीजिए तथा दिए गए उदाहरण के अनुसार लिखिए।
वाक्य
- बल खाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं।
- यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं।
- मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा।
उदाहरण-
| वाक्य | क्रिया-विशेषण | क्रिया, जिसकी विशेषता बताई जा रही है |
| मैं जल्दी-जल्दी चलने लगा। | जल्दी-जल्दी | ‘चलने लगा’ क्रिया की विशेषता |
Solution:
व्याकरण अभ्यास के अनुसार, वाक्यों में क्रिया-विशेषण और संबंधित क्रियाओं की पहचान इस प्रकार है:
क्रिया-विशेषण वे शब्द होते हैं जो क्रिया के होने के ढंग, समय, स्थान या परिमाण की विशेषता बताते हैं।
क्रिया-विशेषण पद पहचान तालिका
| वाक्य | क्रिया-विशेषण | क्रिया, जिसकी विशेषता बताई जा रही है |
| (i) बल खाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं। | कटती हुई | ‘आती थीं’ क्रिया की विशेषता (ढंग/रीति) |
| (ii) यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं। | उस दिशा में | ‘जा रही थीं’ क्रिया की विशेषता (स्थान) |
| (iii) मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा। | देर तक | ‘देखता रहा’ क्रिया की विशेषता (समय/ काल) |
व्याकरणिक स्पष्टीकरण:
- कटती हुई: यह क्रिया के होने के तरीके (रीति) को दर्शा रहा है।
- उस दिशा में: यह क्रिया के होने के स्थान या दिशा का बोध करा रहा है।
- देर तक: यह क्रिया के होने की समय अवधि (काल) को स्पष्ट कर रहा है।
इन पदों के माध्यम से पाठक को क्रिया की पूर्णता और उसकी विशिष्टता का स्पष्ट बोध होता है।
Q.28:
पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे तालिका में दिए गए हैं। इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों का अर्थ बताते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए।
| वाक्य |
|---|
| तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी-पानी था। |
| पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर नारियलों के झुरमुट नजर आ रहे थे। |
| दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी। |
| पश्चिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक श्रृंखला दूर तक चली गई थी। |
| सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान लग रही थी। |
Solution:
शब्द-अर्थ एवं वाक्य निर्माण तालिका
| वाक्य | रेखांकित शब्द | अर्थ | नया वाक्य |
| तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी-पानी था। | क्षितिज | वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैं। | डूबता हुआ सूरज क्षितिज पर बहुत सुंदर लग रहा था। |
| पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर नारियलों के झुरमुट नजर आ रहे थे। | झुरमुट | पेड़ों या झाड़ियों का घना समूह। | तालाब के किनारे बाँसों का एक घना झुरमुट था। |
| दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी। | ढलान | नीचे की ओर झुकी हुई भूमि या उतार। | पहाड़ी रास्तों पर बहुत गहरी ढलान होती है, इसलिए सावधानी से चलना चाहिए। |
| पश्चिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक श्रृंखला दूर तक चली गई थी। | श्रृंखला | कतार, श्रेणी या क्रम (जैसे पर्वतों की कड़ी)। | हिमालय की पर्वत श्रृंखला भारत के उत्तर में स्थित है। |
| सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान लग रही थी। | बीहड़ | ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम स्थान (प्रायः जंगलों या नदियों के किनारे)। | चंबल का इलाका अपने बीहड़ और गहरी घाटियों के लिए जाना जाता है। |
विशेष टिप्पणी:
- क्षितिज: यह शब्द अक्सर विस्तार और असीमता को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
- झुरमुट और श्रृंखला: ये दोनों शब्द समूहवाचक संज्ञा की तरह किसी वस्तु की अधिकता या निरंतरता का बोध कराते हैं।
- बीहड़ और ढलान: ये शब्द किसी स्थान की विशिष्ट भौगोलिक बनावट का वर्णन करते हैं।
Q.29:
कल्पना कीजिए कि आप अपने परिवार के साथ कहीं घूमने गए हैं। वहाँ आपकी भेंट एक ऐसे यात्री से होती है जिसे आपकी सहायता की आवश्यकता है लेकिन आप दोनों एक-दूसरे की भाषा से अपरिचित हैं। ऐसे में उस अनजान यात्री की सहायता आप कैसे करेंगे?
Solution:
भाषा की भिन्नता होने पर भी मानवीय संवेदनाएँ और संकेत एक-दूसरे को समझने में सेतु का कार्य करते हैं। ऐसी स्थिति में मैं उस अनजान यात्री की सहायता निम्नलिखित तरीकों से करूँगा:
- सांकेतिक भाषा का प्रयोग: यदि यात्री को भूख, प्यास या किसी स्थान का रास्ता पूछना है, तो मैं हाथों के इशारों और चेहरे के हाव-भाव (Gestures) के माध्यम से उसकी बात समझने की कोशिश करूँगा।
- चित्रों या मानचित्रों की सहायता: मैं उसे कागज़ पर चित्र बनाकर या अपने फोन में मानचित्र (Map) दिखाकर उसकी समस्या का समाधान करने का प्रयास करूँगा।
- तकनीकी उपकरणों का उपयोग: आज के डिजिटल युग में गूगल ट्रांसलेट (Google Translate) जैसे ऐप्स बहुत उपयोगी हैं। मैं उसके बोले गए वाक्यों को अपनी भाषा में अनुवाद करके उसकी आवश्यकता को समझूँगा और अपनी बात उसे समझाऊँगा।
- वस्तुओं का प्रदर्शन: यदि उसे किसी दवा या विशिष्ट वस्तु की आवश्यकता है, तो मैं आसपास की दुकानों या वस्तुओं की ओर संकेत करके उसकी पहचान करूँगा।
- धैर्य और मुस्कुराहट: सबसे महत्वपूर्ण है कि मैं अपना व्यवहार विनम्र रखूँ। एक छोटी सी मुस्कुराहट और धैर्य उस अनजान यात्री के डर को कम कर सकते हैं और उसे विश्वास दिला सकते हैं कि वह सुरक्षित हाथों में है।
इस प्रकार, भाषा की दीवार होने के बावजूद मैं अपनी सूझबूझ और संवेदनशीलता से उस यात्री की हर संभव सहायता करूँगा।
Q.30:
पधारो म्हारे देश
अपने क्षेत्र के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों की एक सूची बनाइए और उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखकर एक विवरणिका (ब्रॉशर) तैयार कीजिए।
Solution:
“पधारो म्हारे देश” की भावना को आत्मसात करते हुए, राजस्थान के जयपुर (गुलाबी नगरी) पर आधारित एक आकर्षक विवरणिका (ब्रॉशर) निम्नलिखित है:
विवरणिका: गुलाबी नगरी जयपुर का सफर
आमेर किला (Amer Fort):
- विशेषता: अरावली की पहाड़ियों पर स्थित यह किला अपनी हिंदू-मुस्लिम वास्तुकला और ‘शीश महल’ के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ हाथी की सवारी और शाम का लाइट एंड साउंड शो मुख्य आकर्षण हैं।
हवा महल (Hawa Mahal):
- विशेषता: इसे ‘पैलेस ऑफ विंड्स’ कहा जाता है। इसकी 953 झरोखे जैसी खिड़कियाँ शाही महिलाओं को शहर के उत्सव देखने के लिए बनाई गई थीं।
सिटी पैलेस और जंतर-मंतर:
- विशेषता: सिटी पैलेस राजस्थानी और मुगल शैली का मिश्रण है। पास ही स्थित जंतर-मंतर यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल है, जो प्राचीन खगोलीय यंत्रों का संग्रह है।
स्थानीय हस्तशिल्प और व्यंजन:
- विशेषता: यहाँ के भीड़ और रंगीन बाज़ारों में नीली मिट्टी के बर्तन (Blue Pottery) और जयपुरी रज़ाइयाँ मिलती हैं। दाल-बाटी-चूरमा यहाँ का प्रसिद्ध व्यंजन है।
शुभ यात्रा! संपर्क: पर्यटन सूचना केंद्र, जयपुर
यह विवरणिका न केवल पर्यटन स्थलों का दृश्य-वर्णन करती है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक समृद्धि और विरासतों की श्रृंखला से भी यात्रियों को परिचित कराती है।
Q.31:
“ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को ला रहे थे”

‘नाव’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची आगे दी गई है।
नाव (हिंदी); नौ, नौका (संस्कृत); बेड़ी (पंजाबी); किश्ती, नाव (उर्दू); नाव (कश्मीरी); बेड़ी, किश्ती (सिंधी); होड़ी, नाव (मराठी); नाव, होडी (गुजराती); बहड़ी (कोंकणी); नाउ, नौका, ड़ुड्रा (नेपाली); नाओ, नौका (बांग्ला); नाओ (असमिया); हि (मणिपुरी); नौका, नाआ (ओड़िआ); पडव, नाव (तेलुगू); ओडम् (तमिल); तोणि (मलयालम); दोणि (कन्नड़)।
- इनके अतिरिक्त यदि आप ‘नाव’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
- उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
Solution:
भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित भाषाओं के आधार पर ‘नाव’ शब्द की विविधता और अनुवाद निम्नलिखित है:
‘नाव’ के लिए विभिन्न भाषाई शब्द: दिए गए चित्र के अनुसार, ‘नाव’ को संस्कृत में नौका, पंजाबी में बेड़ी, उर्दू और सिंधी में किश्ती, तमिल में ओडम्, और मलयालम में तोणि कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, कोंकणी में इसे बहड़ी और नेपाली में डुङ्गा के नाम से जाना जाता है।
अतिरिक्त भाषाओं में ‘नाव’: उपर्युक्त सूची के अलावा, ‘नाव’ को निम्नलिखित भाषाओं में भी जाना जाता है:
- अंग्रेजी (English): Boat
- अरबी (Arabic): सफ़ीना (Safina)
मातृभाषा (हिंदी) में अनुवाद: “ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को ला रहे थे।” (नोट: चूँकि मेरी मुख्य संचार भाषा हिंदी है, इसलिए यह वाक्य हिंदी में यथावत रहेगा। यदि आपकी मातृभाषा तेलुगु है, तो यह होगा: “మల్లాలు పడవను ఎత్తైన అలల నుండి రక్షిస్తూ తీసుకువస్తున్నారు.”)
यह भाषाई विविधता भारत की ‘अनेकता में एकता’ और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
Q.32:
आपने ‘आखिरी चट्टान तक’ रचना पढ़ी जो दक्षिण भारत की यात्रा पर आधारित है। आइए, अब पढ़ते हैं हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार निर्मल वर्मा का कुंभ मेले पर आधारित यात्रा-वृत्तांत का एक अंश-
| प्रयाग: 1976 मुँह अँधेरे सीटी सुनाई देती है- घनी नींद में सुराख बनाती हुई। एक क्षण पता नहीं चलता, मैं कहाँ हूँ, किस जगह हूँ, कौन-सा समय है? आँखें खुलती हैं, तो ढेस-सा अँधेरा गटगट पीने लगती हैं, जैसे मुँह की प्यास आँखें बुझा रही हैं। याद आता है मेरे नीचे मेरा स्लीपिंग बैग है, मेरी यात्राओं और यातनाओं को ढोता हुआ। मैं जाग गया हूँ- लेकिन मेरी समूची देह गरमाई के घेरे में सो रही है। कुछ देर बाद आँखें अँधेरे में टोहती हुई एक एक चीज पर ठहर जाती है- किताब, तिपाई, लालटेन, फूस का अधखुला दरवाजा, हवा में सरसराती छत। बाहर एक फुसफुसाता हुआ शोर है-रेंगती हुई आवाज़ों का रेला-जैसे हजारों पैर रेत को थपथपाते हुए चल रहे हैं। मैं हड़बड़ाकर अपना स्लीपिंग बैग समेटता हूँ। हाथों में रेत, मिट्टी, फूस के पत्तों को ठेलता हुआ दरवाजा खोलता हूँ, तो ठिठका-सा रह जाता। चाँद दिखाई देता है। पूर्णिमा का पूरा चाँद, इलाहाबाद के किले पर ऊँघता हुआ। पिछली रात उसे गंगा के भीतर देखा था-एक सफेद परछाई, एक झिलमिला-सा स्वप्न- अब समूची रात की यात्रा में थका हुआ वह किले के माथे पर चिपका था, एक गोल, सफेद, मुरझाई बिंदी जिसे सिर्फ एक अँगुली से पोंछा जा सकता था। “आप जाग गए?” सच्चे महाराज का चौकीदार मुझे देखकर कुछ हैरान-सा हो जाता है। दरअसल जब से मैं आया हूँ, वह मुझ पर हैरान है। वह उन्नीस-बीस वर्ष का युवक, जो शायद बचपन में ही आश्रम में बस गया था। मैं जहाँ कहीं भी होता हूँ, वह अपनी फैली फटी-फटी आँखों से मुझे निहारता है- मैं क्या हूँ, यह वह नहीं समझ पाता, न मैं तीर्थयात्री लगता हूँ, न कल्पवासी-मैं उसे आधा हिप्पी, आधा जिप्सीसा दिखाई देता हूँगा- जो अपने पाप-पुण्यों को एक डफल बैग में समेटकर कुंभ मेले में भटकता है। “आप भी संगम जाएँगे?” उसने संदेह से मेरी ओर देखा। “हाँ, इसीलिए आया हूँ” मैंने कहा। “यह सीटी कौन बजा रहा है?” “पुलिस” उसने कहा। “यात्रियों को रास्ता दिखाना पड़ता है- बेचारे ऊँधेरे में भटक जाते हैं।” दबी ठिठुरती आवाजें, भजन की कुछ पंक्तियाँ ठंडी रेत और भूरी चाँदनी पर उठती हैं, किसी बूढ़े स्नानार्थी का काँपता स्वर हवा में बहुत दूर तक रिरियाता रहता है। मैं पंप को ढूँढता हुआ आश्रम का चक्कर लगाता हूँ। लगता है सब सो रहे हैं। हवा में खाली झोपड़ों के दरवाजे सरसराते हैं, खुलते हैं, बंद हो जाते हैं। सब कुटियों से अलग सच्चे महाराज की यज्ञाशाला दिखाई देती है- पीले फूल के मंडप, एक छत पर दूसरी छत- जैसे कोई जापानी पैगोड़ा चाँदनी में चमक रहा हो। |
कुंभ मेले के वृत्तांत का यह अंश आपको रोचक लगा? अब इस यात्रा-वृत्तांत को इंटरनेट, पुस्तकालय से ढूँढकर पूरा पढ़िए।
Solution:
निर्मल वर्मा द्वारा रचित यह यात्रा-वृत्तांत ‘प्रयाग: 1976’ कुंभ मेले के एक अत्यंत आत्मीय और जीवंत पक्ष को प्रस्तुत करता है। लेखक ने मुँह अँधेरे (भोर) के समय की शांति और रहस्यमयी वातावरण का सूक्ष्म चित्रण किया है, जहाँ पुलिस की सीटी और यात्रियों के रेत पर चलने की आवाज़ें एक अनूठा ‘शोर’ पैदा करती हैं।
इस अंश की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- दृश्य चित्रण: इलाहाबाद के किले पर ऊँघता हुआ पूर्णिमा का चाँद और यज्ञाशाला का जापानी ‘पैगोड़ा’ जैसा दिखना दृश्य को भव्य बनाता है।
- मानवीय संवेदना: चौकीदार का लेखक को संदेह और हैरानी से देखना उनके बीच के सांस्कृतिक अंतर (तीर्थयात्री बनाम जिज्ञासु यात्री) को दर्शाता है।
- आत्मानुभूति: लेखक स्वयं को एक ऐसे ‘जिप्सी’ के रूप में देखते हैं जो अपने अनुभवों को डफल बैग में समेटे भटक रहा है।
यह अंश पाठक में कुंभ की आध्यात्मिकता और उस ठिठुरती भोर के रोमांच को जानने की उत्सुकता जगाता है।
Q.33:
इस यात्रा-वृत्तांत में उल्लिखित ‘आखिरी चट्टान’ को ‘विवेकानंद चट्टान’ के नाम से भी जाना जाता है। युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में विवेकानंद के जन्मदिवस 12 जनवरी को भारत में ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ तथा ‘राष्ट्रीय युवा सप्ताह’ के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा सप्ताह के एक हिस्से के रूप में भारत सरकार द्वारा प्रत्येक वर्ष ‘राष्ट्रीय युवा महोत्सव’ का आयोजन किया जाता है। विवेकानंद के जीवन, लेखन और सामाजिक कार्यों के विषय में पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए और कक्षा में चर्चा कीजिए। कुछ लिंक नीचे दिए गए हैं।
स्वामी विवेकानंद- युवाओं के लिए सच्चे आदर्श और मार्गदर्शक https://haryanarajbhavan.gov.in/hi/publication/
स्वामी विवेकानंद- आध्यात्मिक वैज्ञानिक : प्रेस सूचना ब्यूरो, भारत सरकार https://www.pib.gov.in
Solution:
स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के एक महान आध्यात्मिक गुरु और युवाओं के लिए प्रेरणा के अक्षय स्रोत हैं। उन्होंने ‘अध्यात्म’ को ‘विज्ञान’ के साथ जोड़कर समाज को एक नई दिशा दी।
विवेकानंद के जीवन के प्रमुख स्तंभ:
- आदर्श और दर्शन: उनका मानना था कि शिक्षा का अर्थ केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि मनुष्य का चरित्र निर्माण करना है।
- सामाजिक कार्य: उन्होंने ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की, जो आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत के क्षेत्रों में निस्वार्थ सेवा कर रहा है।
- युवा शक्ति: उन्होंने युवाओं को “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए” का मंत्र दिया।
उनके इन्हीं योगदानों के कारण उनके जन्मदिवस को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जो हमें सेवा और राष्ट्रवाद की भावना से जोड़ता है।
NCERT Solutions Class 9 Hindi Ganga
- दो बैलों की कथा
- क्या लिखूँ
- संवादहीन
- ऐसी भी बातें होती हैं
- आखिरी चट्टान तक
- रीढ़ की हड्डी
- मैं और मेरा देश
- रैदास के पद
- राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
- भारति, जय, विजयकरे
- झाँसी की रानी
- घर की याद
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