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रैदास के पद  – NCERT Solutions Class 9 Hindi Ganga

रैदास के पद – NCERT Solutions Class 9 Hindi Ganga includes all the questions with solution given in NCERT Class 9 हिंदी (गंगा) textbook.

NCERT Solutions Class 9

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रैदास के पद – NCERT Solutions


Q.1:

“अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति का भाव है?

Options:
(1) नाम उच्चारण की कठिनाई
(2) नाम रटकर याद करना
(3) आराध्य का नाम जपना ✅
(4) मित्रों का नाम रटना

Explanation:

“अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति में कवि रैदास यह कहना चाहते हैं कि उन्हें राम (भगवान) के नाम का ऐसा प्रेम और लगाव हो गया है कि अब उसे छोड़ पाना संभव नहीं है। यहाँ “रट” का अर्थ केवल याद करना नहीं, बल्कि निरंतर भक्ति भाव से नाम जपना है।
यह पंक्ति अनन्य भक्ति को दर्शाती है, जहाँ भक्त का मन हर समय अपने आराध्य में लगा रहता है। इसलिए यह केवल याद करने या कठिनाई का संकेत नहीं है, बल्कि गहरे प्रेम और समर्पण से भगवान का नाम जपने का भाव व्यक्त करती है।


Q.2:

“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?

Options:
(1) एकाकार और समरूप
(2) तरल और तीव्र सुगंध
(3) आश्रय और आश्रित ✅
(4) द्रव और ठोस

Explanation:

“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” में कवि रैदास ने भक्त और भगवान के संबंध को बहुत सुंदर उपमा से समझाया है। चंदन (प्रभु) की सुगंध तभी फैलती है जब वह पानी (भक्त) के साथ मिलती है। यहाँ पानी चंदन पर निर्भर है और चंदन भी अपनी सुगंध को प्रकट करने के लिए पानी का सहारा लेता है।

इससे स्पष्ट होता है कि भगवान आश्रय (सहारा देने वाले) हैं और भक्त आश्रित (उन पर निर्भर रहने वाला) है। दोनों का संबंध गहरा और जुड़ा हुआ है, लेकिन आधार भगवान ही हैं।


Q.3:

“तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है?

Options:
(1) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है।
(2) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।
(3) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है।
(4) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है। ✅

Explanation:

“तुम दीपक, हम बाती” में संत रैदास यह भाव व्यक्त करते हैं कि जैसे दीपक और बाती साथ मिलकर ही प्रकाश देते हैं, वैसे ही भक्त और भगवान का संबंध भी मिलन से ही सार्थक होता है।
दीपक (प्रभु) और बाती (भक्त) के जुड़ने पर ही ज्योति जलती है, जो अंधकार को दूर करती है। इसी प्रकार जब भक्त अपने आराध्य से जुड़ता है, तब उसका जीवन ज्ञान, भक्ति और प्रकाश से भर जाता है।


Q.4:

“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?

Options:
(1) परोपकारी भक्ति भाव
(2) आराध्य से अटूट संबंध ✅
(3) सांसारिक मोह
(4) कर्मकांड पर बल

Explanation:

“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” में संत रैदास यह कहते हैं कि यदि भगवान भी उनसे संबंध तोड़ दें, तब भी वे भगवान से अपना संबंध नहीं तोड़ेंगे। यह पंक्ति उनके दृढ़ निश्वास, अटूट प्रेम और अनन्य भक्ति को दर्शाती है।
यहाँ भक्त की ऐसी निष्ठा दिखाई देती है जो किसी भी परिस्थिति में नहीं बदलती। इसलिए यह आराध्य से अटूट संबंध का भाव प्रकट करती है, न कि कर्मकांड या सांसारिक मोह का।


Q.5:

“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति से आप क्या समझते हैं?

Options:
(1) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।
(2) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं।
(3) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।
(4) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है। ✅

Explanation:

“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति में संत रैदास यह स्पष्ट करते हैं कि उन्हें तीर्थ-यात्रा और व्रत करने की चिंता नहीं है, क्योंकि उनका पूरा विश्वास भगवान के चरणों में है।
यहाँ कवि बाहरी कर्मकांडों की अपेक्षा सच्ची भक्ति और प्रभु-चरणों में समर्पण को अधिक महत्त्व देते हैं। उनका मानना है कि वास्तविक शांति और मुक्ति भगवान के चरणों में ही मिलती है।


Q.6:

सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?

Options:
(1) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा” ✅
(2) “जाकी जोति बैरे दिन राती”
(3) “तुम दीपक, हम बाती”
(4) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”

Explanation:

इस पंक्ति में संत रैदास यह भाव व्यक्त करते हैं कि भगवान हर जगह विद्यमान हैं, इसलिए जहाँ भी जाओ, वहीं उनकी पूजा होती है। यह सर्वव्यापक (हर स्थान पर उपस्थित) ईश्वर की अवधारणा को स्पष्ट करता है।
अन्य विकल्प किसी विशेष संबंध या भक्ति-भाव को दर्शाते हैं, लेकिन केवल यही पंक्ति ईश्वर के हर जगह होने के विचार को सीधे प्रकट करती है।


Q.7:

नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए- “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”

Solution:

अर्थ: इस पंक्ति में संत रैदास कहते हैं कि हे प्रभु! आप बादल (घन) के समान हैं और मैं मोर के समान हूँ। जिस प्रकार मोर बादलों को देखकर आनंदित होकर नाच उठता है, उसी प्रकार मैं भी आपको देखकर आनंद से भर जाता हूँ। आगे वे कहते हैं कि जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा को प्रेम से निहारता रहता है, वैसे ही मेरा मन भी सदा आपकी ओर लगा रहता है।
भाव: इस पंक्ति में भक्त और भगवान के बीच गहरे प्रेम, आकर्षण और अटूट संबंध को व्यक्त किया गया है। भक्त अपने आराध्य के दर्शन से अत्यंत प्रसन्न होता है और उसका मन हर समय भगवान में ही लगा रहता है। यहाँ अनन्य भक्ति, प्रेम और समर्पण का सुंदर भाव प्रकट होता है।


Q.8:

नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए- “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”

Solution:

अर्थ: इस पंक्ति में संत रैदास कहते हैं कि उन्हें तीर्थ-यात्रा और व्रत करने की कोई चिंता या आवश्यकता नहीं लगती। उनका एकमात्र सहारा और विश्वास भगवान के चरण-कमलों में ही है।

भाव: यहाँ कवि सच्ची भक्ति की महत्ता को बताते हैं। वे बाहरी कर्मकांडों (तीर्थ, व्रत) को छोड़कर मन से की गई भक्ति और प्रभु-चरणों में पूर्ण समर्पण को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। इस पंक्ति में अटूट विश्वास, निष्ठा और सच्चे आश्रय का भाव व्यक्त होता है।


Q.9:

“जो तुम तोरौ राम में नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।

Solution:

इस पंक्ति “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” से संत रैदास की अपने आराध्य के प्रति गहरी निष्ठा और अटूट भक्ति का भाव स्पष्ट होता है। वे कहते हैं कि यदि भगवान भी उनसे संबंध तोड़ लें, तब भी वे भगवान से अपना संबंध कभी नहीं तोड़ेंगे। इससे यह समझ में आता है कि सच्चा भक्त किसी भी परिस्थिति में अपने आराध्य से विमुख नहीं होता। उसकी भक्ति स्वार्थ या लाभ पर आधारित नहीं होती, बल्कि सच्चे प्रेम और विश्वास पर टिकी होती है। रैदास की यह भावना हमें सिखाती है कि जीवन में कठिनाइयाँ आने पर भी हमें अपने विश्वास और मूल्यों को नहीं छोड़ना चाहिए। यह पंक्ति अडिग श्रद्धा, समर्पण और सच्ची भक्ति का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती है।


Q.10:

रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?

Solution:

संत रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर प्रभु-चरणों की सच्ची भक्ति और पूर्ण समर्पण को भक्ति का प्रमुख आधार माना है। उनके अनुसार बाहरी कर्मकांड उतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि मन से किया गया प्रेम और विश्वास। वे कहते हैं कि भगवान के चरणों में ही सच्चा आश्रय है, इसलिए वही सबसे श्रेष्ठ साधन है।
मेरे विचार से भक्ति के आधार श्रद्धा, विश्वास, प्रेम, समर्पण और सच्चे मन से स्मरण हो सकते हैं। जब व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के भगवान को याद करता है और अच्छे कर्म करता है, तब उसकी भक्ति सच्ची मानी जाती है। केवल पूजा-पाठ या व्रत करने से नहीं, बल्कि अच्छे विचार, दूसरों की सहायता और ईमानदारी से भी भक्ति प्रकट होती है। इस प्रकार, सच्ची भक्ति मन की शुद्धता और व्यवहार की अच्छाई पर आधारित होती है।


Q.11:

रैदास के दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।

Solution:

संत रैदास ने दोनों पदों में भक्त और आराध्य के गहरे संबंध को कई सुंदर प्रतीकों और उपमाओं के माध्यम से व्यक्त किया है। पहले पद में वे कहते हैं- चंदन और पानी, जिससे सुगंध फैलती है; बादल और मोर, जहाँ मोर बादल को देखकर आनंदित होता है; चंद्रमा और चकोर, जिसमें चकोर चंद्रमा को निहारता है; दीपक और बाती, जो मिलकर प्रकाश देते हैं; तथा मोती और धागा, जो मिलकर सुंदर आभूषण बनाते हैं। इन उपमाओं के माध्यम से रैदास यह बताना चाहते हैं कि भक्त और भगवान का संबंध बहुत गहरा, अटूट और परस्पर जुड़ा हुआ होता है। दूसरे पद में भी यह संबंध निष्ठा और समर्पण के रूप में प्रकट होता है, जहाँ भक्त हर परिस्थिति में भगवान से जुड़ा रहता है। इन सभी प्रतीकों से प्रेम, एकता और अटूट भक्ति का भाव प्रकट होता है।


Q.12:

कविता का सौंदर्य

  • “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
    उपर्युक्त पंक्ति के रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए। इसमें अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। जिस रचना में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
  • “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।” उपर्युक्त रेखांकित अंश में उपमा अलंकार है। किसी प्रसिद्ध वस्तु की समानता के आधार पर जब किसी वस्तु या व्यक्ति के रूप, गुण, धर्म का वर्णन किया जाता है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है।
  • “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” उपर्युक्त रेखांकित अंश में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित किया जाए।

अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।

Solution:

  1. अनुप्रास अलंकार (एक ही व्यंजन की बार-बार आवृत्ति)
    • “कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।”
      यहाँ ‘क’ वर्ण की बार-बार आवृत्ति है।
    • “गगन घन घमंड गरजत घोरा।”
      ‘ग’ और ‘घ’ वर्ण की पुनरावृत्ति से अनुप्रास बना है।
  2. उपमा अलंकार (जैसे, सा, समान आदि द्वारा तुलना)
    • “उसका मुख चाँद सा सुंदर है।”
      मुख की तुलना चाँद से की गई है।
    • “वह सिंह के समान वीर है।”
      वीरता की तुलना सिंह से की गई है।
  3. रूपक अलंकार (सीधा आरोप, बिना ‘जैसे’ के)
    • “चरण कमल बंदौ हरि राई।”
      यहाँ चरणों को कमल ही मान लिया गया है।
    • “जीवन एक संग्राम है।”
      जीवन को सीधे संग्राम कहा गया है।

Q.13:

कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ
नीचे दी गई सूची को ध्यान से देखिए। इस सूची में रैदास के दोनों पदों से कुछ विशेषताएँ चुनकर दी गई हैं। पदों में से चुनकर इन विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए। उदाहरण के लिए पहली विशेषता के सामने पंक्ति दी गई है।

विशेषताएँउदाहरण
अनन्य भक्ति भाव“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।”
सरल और लोकधर्मी भाषा 
उपमा और तुलना 
लयात्मकता और गेयता/ध्वन्यात्मकता 
दृढ़ निष्ठा और आस्था 

Solution:

सरल और लोकधर्मी भाषा

उदाहरण:
“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”
→ इसमें सरल, बोलचाल की भाषा का प्रयोग है।

उपमा और तुलना

उदाहरण:
“प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
→ यहाँ ‘जैसे’ के माध्यम से तुलना की गई है।

लयात्मकता और गेयता/ध्वन्यात्मकता

उदाहरण:
“प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बैर दिन राती।”
→ इसमें तुक और लय है, जिससे गेयता उत्पन्न होती है।

दृढ़ निष्ठा और आस्था

उदाहरण:
“सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।”
→ यहाँ अटूट विश्वास और निरंतर भक्ति दिखाई देती है।


Q.14:

तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं?

Solution:

भक्तिकाल में समाज कई प्रकार की कुरीतियों और भेदभावों से ग्रस्त था। धर्म के नाम पर आडंबर, कर्मकांड (तीर्थ, व्रत) और पंडितों-मौलवियों का प्रभुत्व बढ़ गया था। सामान्य जनता के लिए इन कर्मकांडों का पालन करना कठिन और महँगा था।

साथ ही, जाति-भेद और ऊँच-नीच बहुत अधिक था। निम्न वर्ग के लोगों को मंदिरों और धार्मिक कार्यों से दूर रखा जाता था। इससे समाज में असमानता और अन्याय बढ़ रहा था।

ऐसी स्थिति में संत रैदास और कबीर जैसे संतों ने निराकार ईश्वर (निर्गुण भक्ति) और आंतरिक भक्ति पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए न तो तीर्थ-व्रत जरूरी हैं और न ही बाहरी दिखावा, बल्कि सच्चे मन, प्रेम और विश्वास से ही भगवान को पाया जा सकता है।

इसके पीछे मुख्य कारण थे:

  • धार्मिक आडंबरों और कर्मकांडों का विरोध
  • जाति-प्रथा और सामाजिक भेदभाव को समाप्त करना
  • सभी के लिए सरल और सुलभ भक्ति का मार्ग देना
  • हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक समरसता स्थापित करना

इस प्रकार, उस समय की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों ने रैदास और कबीर को सरल, निराकार और समानता पर आधारित भक्ति मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया।


Q.15:

“सोने मिलत सुहागा”
‘सुहागा’ एक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। ‘सुहागा’ का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।

Solution:

‘सुहागा’ का रासायनिक नाम सोडियम टेट्राबोरेट (Borax) है। इसका रासायनिक सूत्र सामान्यतः Na2B4O7·10H2O (सोडियम टेट्राबोरेट डेकाहाइड्रेट) होता है।

सुहागा (Borax) की विशेषताएँ:

  • यह एक प्राकृतिक खनिज है, जो सफेद या रंगहीन क्रिस्टल के रूप में पाया जाता है।
  • यह पानी में घुलनशील होता है।
  • इसमें क्षारीय (alkaline) गुण होते हैं।
  • गर्म करने पर यह जल-अणु (water of crystallization) खो देता है और फूल जाता है।
  • यह सफाई और धातु शोधन (refining) में उपयोगी है- विशेषकर सोने की अशुद्धियाँ हटाने में।
  • इसका उपयोग काँच, साबुन, डिटर्जेंट और सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में भी किया जाता है।

इसलिए “सोने मिलत सुहागा” का अर्थ है- किसी अच्छी वस्तु के साथ कुछ ऐसा जुड़ जाना जो उसे और भी अधिक श्रेष्ठ बना दे।


Q.16:

पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।

Solution:

दिए गए पदों से ही संज्ञा और सर्वनाम के उदाहरण चुनते हैं:

संज्ञा (Noun) के उदाहरण:

  1. राम
  2. चंदन
  3. मोती

(अन्य भी हो सकते हैं जैसे: घन, दीपक, चरन, हरि आदि)

सर्वनाम (Pronoun) के उदाहरण:

  1. तुम
  2. मैं
  3. हम

(अन्य उदाहरण: तुम्हरे, तुम सौ आदि)


Q.17:

रैदास के इन दोनों पदों में बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों को देखिए। आप या आपके आस-पास के लोग इन शब्दों के लिए किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए।
[मोरा, चकोरा, बाती, राती, सोने, तीरथ, बरत]

Solution:

दिए गए शब्दों के स्थान पर बोलचाल में प्रयोग होने वाले अन्य शब्द इस प्रकार लिखे जा सकते हैं:

शब्द – अन्य प्रचलित रूप

  • मोरा → मोर
  • चकोरा → चकोर (एक पक्षी)
  • बाती → बत्ती
  • राती → रात
  • सोने → स्वर्ण / सोना
  • तीरथ → तीर्थ
  • बरत → व्रत

Q.18:

कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को गाकर/पाठ करके प्रस्तुत कीजिए।

Solution:

प्रस्तुति कैसे करें:

  • 4–6 विद्यार्थियों का एक समूह बनाओ।
  • दोनों पदों को अच्छे उच्चारण और लय के साथ गाने या पढ़ने का अभ्यास करो।
  • एक छात्र पहला पद, दूसरा दूसरा पद ले सकता है या सब मिलकर भी गा सकते हैं।
  • लय (rhythm) बनाए रखने के लिए हल्की ताल (जैसे ताली) का प्रयोग कर सकते हो।
  • भाव के अनुसार प्रस्तुति करो —
    • पहले पद में समर्पण और प्रेम दिखे
    • दूसरे पद में निष्ठा और विश्वास

ध्यान रखने योग्य बातें:

  • शब्द स्पष्ट और शुद्ध बोलो
  • गति न बहुत तेज हो, न बहुत धीमी
  • भाव (expression) के साथ प्रस्तुति करो
  • सभी सदस्य भाग लें

Q.19:

कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।

Solution:

संवाद-लेखन: भक्त और आराध्य का संवाद

भक्त: प्रभु जी, आप चंदन हैं और मैं पानी। आपसे मिलकर ही मेरी पहचान है।
आराध्य: भक्त, जैसे चंदन की सुगंध पानी में बस जाती है, वैसे ही मैं तुम्हारे हृदय में सदैव रहता हूँ।

भक्त: प्रभु जी, आप घन हैं और मैं मोर। आपके बिना मेरा मन व्याकुल रहता है।
आराध्य: जब-जब तुम मुझे याद करते हो, मैं तुम्हारे पास ही होता हूँ, जैसे मेघों से मोर प्रसन्न हो उठता है।

भक्त: प्रभु जी, आप दीपक हैं और मैं बाती। आपके बिना मैं अंधकार में हूँ।
आराध्य: तुम्हारे प्रेम से ही मेरी ज्योति प्रकाशित होती है, हम दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

भक्त: प्रभु जी, आप मोती हैं और मैं धागा। आपसे जुड़कर ही मेरा जीवन सुंदर बनता है।
आराध्य: जैसे धागा मोती को संभालता है, वैसे ही तुम मुझे अपने प्रेम से बाँधे रखते हो।

भक्त: प्रभु जी, आप स्वामी हैं और मैं दास। मेरा सब कुछ आप ही हैं।
आराध्य: तुम्हारी भक्ति ही तुम्हें मेरे सबसे निकट लाती है, मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ।


Q.20:

“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।

Solution:

लघुकथा: अटूट मित्रता

रवि और अजय बचपन से गहरे मित्र थे। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे और हर काम साथ करते थे। एक दिन स्कूल में किसी बात पर दोनों के बीच गलतफहमी हो गई। गुस्से में आकर अजय ने कहा कि वह अब रवि से दोस्ती तोड़ देगा।

रवि ने शांत होकर कहा, “जो तुम तोड़ो, मैं नहीं तोड़ूँगा।” उसके मन में रैदास की यह पंक्ति गूँज रही थी- “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ।”

कुछ दिनों बाद अजय को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आया कि सच्ची मित्रता छोटी-छोटी बातों पर टूटती नहीं है। वह रवि के पास गया और माफी माँगी। रवि ने मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया।

उस दिन दोनों ने सीखा कि सच्ची मित्रता वही है जो कठिन परिस्थितियों में भी न टूटे और एक-दूसरे के प्रति विश्वास बना रहे।


Q.21:

आपने रैदास के पद पढ़े। अब आप रैदास की तरह ही महाराष्ट्र के संत कवि नामदेव के आगे दिए गए दो पद पढ़िए। निर्गुण संत काव्य परंपरा के संत कवि नामदेव का जन्म 13 वीं-14वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में हुआ। अन्य संत कवियों की भाँति नामदेव ने भी बाह्य आडंबरों, सामाजिक रूढ़ियों का विरोध कर सामाजिक समरसता, प्रेम एवं निराकार भक्ति से संबंधित पदों की रचना की है।

  1. माइ न होती बापु न होता करम न होती काया।
    हम नहिं होते, तुम नहिं होते, कवन कहां ते आया।।
    राम कोइ न किसही केरा। जैसे तरवर पंखि-बसेरा।।
    चंद न होता, सूर न होता, पानी पवनु मिलाया।
    सास्त्र न होता बेद न होता, करमु कहां ते आया।।
    खेचरि भूचरि तुलसी माला गुरपरसादी पाया।
    नामा प्रणवै परम तत्त कूं सतगुर मोहि लखाया।।
  2. मोहि लागति तालाबेली।
    बछरा बिनु गाइ अकेली।।
    पानी बिनु ज्यूं मीन तलफैं।
    ऐसे रामनाम बिनु नामा कलपै।।
    जैसे गाइ का बाछा छूटला।।
    थन चोखता माखन घूटला।।
    नामदेउ नारायन पाया।
    गुर भेटत ही अलख लखाया।।
    जैसे विषै हेत परनारी।
    ऐसे नामे प्रीति मुरारी।।
    जैसे ताप ते निरमल घामा।
    तैसे रामनाम बिनु बापुरो नामा।।

अब अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और बताइए कि रैदास तथा नामदेव के पदों में क्या-क्या अंतर है और क्या-क्या समानताएँ हैं?

Solution:

समानताएँ (Similarities)

  • दोनों ही संत कवि निर्गुण भक्ति परंपरा से जुड़े हैं।
  • दोनों पदों में ईश्वर की सर्वव्यापकता और निराकार रूप पर बल दिया गया है।
  • दोनों कवि बाह्य आडंबर, कर्मकांड और दिखावे का विरोध करते हैं।
  • दोनों में गुरु और भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
  • दोनों के पदों में सरल और लोकभाषा का प्रयोग हुआ है।
  • दोनों ही कवि प्रेम, समर्पण और समानता का संदेश देते हैं।

अंतर (Differences)

  • रैदास के पदों में मुख्य रूप से भक्त और ईश्वर के बीच अटूट संबंध और समर्पण (जैसे चंदन-पानी, दीपक-बाती) दिखाया गया है।
  • जबकि नामदेव के पदों में सृष्टि की उत्पत्ति, प्रकृति और जीवन के उदाहरणों (जैसे गाय-बछड़ा, मछली-पानी) के माध्यम से भक्ति को समझाया गया है।
  • रैदास के पदों में भावनात्मक समर्पण और तुलना अधिक है,
    जबकि नामदेव के पदों में दार्शनिक विचार और जीवन-प्रकृति के उदाहरण अधिक हैं
  • रैदास का स्वर अधिक व्यक्तिगत भक्ति (भक्त-ईश्वर संबंध) पर केंद्रित है,
    जबकि नामदेव का स्वर अधिक सार्वभौमिक और सृष्टि-व्याख्यात्मक है।

निष्कर्ष:

दोनों संत कवियों का उद्देश्य एक ही है—ईश्वर की भक्ति, समानता और आडंबरों का विरोध, लेकिन उनके अभिव्यक्ति के तरीके अलग-अलग हैं।


Q.22:

रैदास के जीवन और पदों के विषय में पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए। कुछ लिंक नीचे दिए गए हैं।

https://youtu.be/zZoAghETdgI
https://youtu.be/0vfpBMozOXY

Solution:

संत रैदास का जीवन परिचय

रैदास 15वीं शताब्दी के प्रसिद्ध संत कवि थे, जिनका जन्म काशी (वाराणसी) के पास हुआ माना जाता है। वे भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में से एक थे और उनका संबंध निर्गुण भक्ति परंपरा से था।

वे निम्न जाति (चर्मकार समुदाय) से थे, लेकिन उन्होंने समाज में फैले जाति-भेद और ऊँच-नीच का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर सबके लिए समान हैं और उन्हें पाने के लिए किसी प्रकार के भेदभाव की आवश्यकता नहीं है।

रैदास की शिक्षाएँ और विचार

  • ईश्वर निराकार (निर्गुण) हैं और सभी में विद्यमान हैं
  • सच्ची भक्ति का आधार प्रेम, विश्वास और समर्पण है
  • बाह्य आडंबर, तीर्थ और व्रत का कोई महत्व नहीं
  • सभी मनुष्य समान हैं, जाति के आधार पर कोई भेद नहीं होना चाहिए
  • उन्होंने एक आदर्श समाज की कल्पना की जिसे “बेगमपुरा” कहा गया

रैदास के पदों की विशेषताएँ

  • उनके पदों में भक्त और ईश्वर का अटूट संबंध दिखाया गया है
  • उदाहरणों द्वारा भक्ति समझाई गई है जैसे:
    • चंदन–पानी
    • दीपक–बाती
    • मोती–धागा
    • घन–मोर
  • उनके पदों में सरल, लोकभाषा (ब्रजभाषा) का प्रयोग है
  • पदों में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग मिलता है
  • भक्ति का स्वरूप भावनात्मक और प्रेमपूर्ण है

निष्कर्ष

रैदास के जीवन और पद हमें यह सिखाते हैं कि
ईश्वर को पाने का मार्ग बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति, प्रेम और समानता है।

NCERT Solutions Class 9 Hindi Ganga

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