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Posted by Anjali Shriwas 4 years, 9 months ago (11044801)
- 3 answers
Harshika Sajwan 4 years, 9 months ago (11017270)
Posted by Naveen Sahu 4 years, 9 months ago (11016444)
- 2 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
Two charges qA = 5 {tex}\times{/tex} 10-8C and qB = -3 {tex}\times{/tex} 10-8C
Distance between two charges, r = 16 cm = 0.16 cm
Consider a point O on the line joining two charges where the electric potential is zero due to two charges.

From the figure we can see that, x = distance of point O from charge qA
Electric potential at point O due to qA,
{tex}\mathrm{V}_{\mathrm{A}}=\frac{\mathrm{q}_{\mathrm{A}}}{4 \pi \varepsilon_{0}(\mathrm{AO})}{/tex}
{tex}=9 \times 10^{9} \times \frac{5 \times 10^{-8}}{\mathrm{x}}{/tex}
{tex}=\frac{450}{\mathrm{x}}{/tex}
Electric potential at point O due to qB
{tex}\mathrm{V}_{\mathrm{B}}=\frac{\mathrm{q}_{\mathrm{B}}}{4 \pi \varepsilon_{0}(\mathrm{BO})}{/tex}
{tex}=9 \times 10^{9} \times \frac{-3 \times 10^{-8}}{0.16-\mathrm{x}}{/tex}
{tex}=\frac{-270}{0.16-X}{/tex}
Since the total electric potential at O is zero,
{tex}\Rightarrow{/tex} VA + VB = 0
{tex}\Rightarrow \frac{450}{x}+\left(-\frac{270}{0.16-x}\right)=0{/tex}
{tex}\Rightarrow \frac{450}{x}=\frac{270}{0.16-x}{/tex}
{tex}\Rightarrow \frac{5}{x}=\frac{3}{0.16-x}{/tex}
On cross multiplying we get,
5 {tex}\times{/tex} (0.16 - x) = 3x
{tex}\Rightarrow{/tex} = 0.8 - 5x = 3x
{tex}\Rightarrow{/tex} 8x = 0.8
{tex}\Rightarrow{/tex} x = 0.1m = 10cm (from charge qA)
{tex}\therefore{/tex} at a distance of 10cm from the positive charge, the potential is zero between the two charges.
Posted by Vikrant Jadon 4 years, 9 months ago (9650607)
- 5 answers
Unaiza Ansari 4 years, 4 months ago (11792794)
Unaiza Ansari 4 years, 4 months ago (11792794)
Posted by Vikrant Jadon 4 years, 9 months ago (9650607)
- 2 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
A computer is a device which has functions of receiving, storing and suitably processing data. A computer is automated to perform logical or arithmetic operations.
Shraddha Nayak 4 years, 8 months ago (11149473)
Posted by Sabir Mansuri 4 years, 9 months ago (10584475)
- 2 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
Multimedia in Various Fields
- Use of Multimedia in Advertising Industry.
- Use of Multimedia in Education.
- Use of Multimedia in Mass Media and Journalism.
- Use of Multimedia in Gaming Industry.
- Use of Multimedia in Science and Technology.
- Use of Multimedia in Pre-Production.
- Use of Multimedia in Post Production.
Posted by Rithika Rithika 4 years, 9 months ago (10709230)
- 3 answers
Posted by Kundan Singh 4 years, 9 months ago (11048870)
- 3 answers
Posted by Dimpal Soni # 4 years, 9 months ago (10996998)
- 1 answers
Posted by Dimpal Soni # 4 years, 9 months ago (10996998)
- 2 answers
Yashika Garg 4 years, 7 months ago (11201573)
Posted by Jagdish Panda 4 years, 9 months ago (11049272)
- 5 answers
Posted by Yash Tiwari 4 years, 9 months ago (11050708)
- 4 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
कवि परिचय
हरिवंश राय बच्चन
जीवन परिचय-कविवर हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर सन 1907 को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा 1942-1952 ई० तक यहीं पर प्राध्यापक रहे। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड से पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। अंग्रेजी कवि कीट्स पर उनका शोधकार्य बहुत चर्चित रहा। वे आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से संबंद्ध रहे और फिर विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ रहे। उन्हें राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया। 1976 ई० में उन्हें ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया गया। ‘दो चट्टानें’ नामक रचना पर उन्हें साहित्य अकादमी ने भी पुरस्कृत किया। उनका निधन 2003 ई० में मुंबई में हुआ।<script async="" src="//pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"></script>
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</script>रचनाएँ-हरिवंश राय बच्चन की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
- काव्य-संग्रह-मधुशाला (1935), मधुबाला (1938), मधुकलश (1938), निशा-निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल-अंतर, मिलनयामिनी, सतरंगिणी, आरती और अंगारे, नए-पुराने झरोखे, टूटी-फूटी कड़ियाँ।
- आत्मकथा-क्या भूलें क्या याद करूं, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक।
- अनुवाद-हैमलेट, जनगीता, मैकबेथ।
- डायरी-प्रवासी की डायरी।
काव्यगत विशेषताएँ-बच्चन हालावाद के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। दोनों महायुद्धों के बीच मध्यवर्ग के विक्षुब्ध विकल मन को बच्चन ने वाणी दी। उन्होंने छायावाद की लाक्षणिक वक्रता की बजाय सीधी-सादी जीवंत भाषा और संवेदना से युक्त गेय शैली में अपनी बात कही। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में घटी घटनाओं की सहजअनुभूति की ईमानदार अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से की है। यही विशेषता हिंदी काव्य-संसार में उनकी प्रसिद्ध का मूलाधार है। भाषा-शैली-कवि ने अपनी अनुभूतियाँ सहज स्वाभाविक ढंग से कही हैं। इनकी भाषा आम व्यक्ति के निकट है। बच्चन का कवि-रूप सबसे विख्यात है उन्होंने कहानी, नाटक, डायरी आदि के साथ बेहतरीन आत्मकथा भी लिखी है। इनकी रचनाएँ ईमानदार आत्मस्वीकृति और प्रांजल शैली के कारण आज भी पठनीय हैं।
कविताओं का प्रतिपादय एवं सार
आत्मपरिचय
प्रतिपादय-कवि का मानना है कि स्वयं को जानना दुनिया को जानने से ज्यादा कठिन है। समाज से व्यक्ति का नाता खट्टा-मीठा तो होता ही है। संसार से पूरी तरह निरपेक्ष रहना संभव नहीं। दुनिया अपने व्यंग्य-बाण तथा शासन-प्रशासन से चाहे जितना कष्ट दे, पर दुनिया से कटकर मनुष्य रह भी नहीं पाता। क्योंकि उसकी अपनी अस्मिता, अपनी पहचान का उत्स, उसका परिवेश ही उसकी दुनिया है।
कवि अपना परिचय देते हुए लगातार दुनिया से अपने द्रविधात्मक और द्वंद्वात्मक संबंधों का मर्म उद्घाटित करता चलता है। वह पूरी कविता का सार एक पंक्ति में कह देता है कि दुनिया से मेरा संबंध प्रीतिकलह का है, मेरा जीवन विरुद्धों का सृामंजस्य है- उन्मादों में अवसाद, रोदन में राग, शीतल वाणी में आग, विरुद्धों का विरोधाभासमूलक सामंजस्य साधते-साधते ही वह बेखुदी, वह मस्ती, वह दीवानगी व्यक्तित्व में उत्तर आई है कि दुनिया का तलबगार नहीं हूँ। बाजार से गुजरा हूँ, खरीदार नहीं हूँ-जैसा कुछ कहने का ठस्सा पैदा हुआ है। यह ठस्सा ही छायावादोत्तर गीतिकाव्य का प्राण है।
किसी असंभव आदर्श की तलाश में सारी दुनियादारी ठुकराकर उस भाव से कि जैसे दुनिया से इन्हें कोई वास्ता ही नहीं है। सार-कवि कहता है कि यद्यपि वह सांसारिक कठिनाइयों से जूझ रहा है, फिर भी वह इस जीवन से प्यार करता है। वह अपनी आशाओं और निराशाओं से संतुष्ट है। वह संसार से मिले प्रेम व स्नेह की परवाह नहीं करता क्योंकि संसार उन्हीं लोगों की जयकार करता है जो उसकी इच्छानुसार व्यवहार करते हैं। वह अपनी धुन में रहने वाला व्यक्ति है। वह निरर्थक कल्पनाओं में विश्वास नहीं रखता क्योंकि यह संसार कभी भी किसी की इच्छाओं को पूर्ण नहीं कर पाया है। कवि सुख-दुख, यश-अपयश, हानि-लाभ आदि द्वंद्वात्मक परिस्थितियों में एक जैसा रहता है। यह संसार मिथ्या है, अत: यहाँ स्थायी वस्तु की कामना करना व्यर्थ है।
कवि संतोषी प्रवृत्ति का है। वह अपनी वाणी के जरिये अपना आक्रोश व्यक्त करता है। उसकी व्यथा शब्दों के माध्यम से प्रकट होती है तो संसार उसे गाना मानता है। संसार उसे कवि कहता है, परंतु वह स्वयं को नया दीवाना मानता है। वह संसार को अपने गीतों, द्वंद्वों के माध्यम से प्रसन्न करने का प्रयास करता है। कवि सभी को सामंजस्य बनाए रखने के लिए कहता है।
एक गीत
प्रतिपादय-निशा-निमंत्रण से उद्धृत इस गीत में कवि प्रकृति की दैनिक परिवर्तनशीलता के संदर्भ में प्राणी-वर्ग के धड़कते हृदय को सुनने की काव्यात्मक कोशिश व्यक्त करता है। किसी प्रिय आलंबन या विषय से भावी साक्षात्कार का आश्वासन ही हमारे प्रयास के पगों की गति में चंचल तेजी भर सकता है-अन्यथा हम शिथिलता और फिर जड़ता को प्राप्त होने के अभिशिप्त हो जाते हैं। यह गीत इस बड़े सत्य के साथ समय के गुजरते जाने के एहसास में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा भी लिए हुए है।
सार-कवि कहता है कि साँझ घिरते ही पथिक लक्ष्य की ओर तेजी से कदम बढ़ाने लगता है। उसे रास्ते में रात होने का भय होता है। जीवन-पथ पर चलते हुए व्यक्ति जब अपने लक्ष्य के निकट होता है तो उसकी उत्सुकता और बढ़ जाती है। पक्षी भी बच्चों की चिंता करके तेजी से पंख फड़फड़ाने लगते हैं। अपनी संतान से मिलने की चाह में हर प्राणी आतुर हो जाता है। आशा व्यक्ति के जीवन में नई चेतना भर देती है। जिनके जीवन में कोई आशा नहीं होती, वे शिथिल हो जाते हैं। उनका जीवन नीरस हो जाता है। उनके भीतर उत्साह समाप्त हो जाता है। अत: रात जीवन में निराशा नहीं, अपितु आशा का संचार भी करती है।
Ruhul Amin Islam 2 years ago (11077164)
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
आत्मपरिचय
- मैं जग – जीवन का मार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;
कर दिया किसी ने प्रकृत जिनको छूकर
मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हुँ !
मैं स्नेह-सुरा का पान किया कस्ता हूँ,
में कभी न जग का ध्यान किया करता हुँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ !
शब्दार्थ- जग-जीवन-सांसारिक गतिविधि। द्वकृत-तारों को बजाकर स्वर निकालना। सुरा-शराब। स्नेह-प्रेम। यान-पीना। ध्यान करना-परवाह करना। गाते-प्रशंसा करते।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध विंशरायबच्नहैं इसाकवता मेंकवजनजनेक शैलो बताहैतथा दुनयासेआने क्वाकस्बोंकडबार करता हैं ।
व्याख्या- बच्चन जी कहते हैं कि मैं संसार में जीवन का भार उठाकर घूमता रहता हूँ। इसके बावजूद मेरा जीवन प्यार से भरा-पूरा है। जीवन की समस्याओं के बावजूद कवि के जीवन में प्यार है। उसका जीवन सितार की तरह है जिसे किसी ने छूकर झंकृत कर दिया है। फलस्वरूप उसका जीवन संगीत से भर उठा है। उसका जीवन इन्हीं तार रूपी साँसों के कारण चल रहा है। उसने स्नेह रूपी शराब पी रखी है अर्थात प्रेम किया है तथा बाँटा है। उसने कभी संसार की परवाह नहीं की। संसार के लोगों की प्रवृत्ति है कि वे उनको पूछते हैं जो संसार के अनुसार चलते हैं तथा उनका गुणगान करते हैं। कवि अपने मन की इच्छानुसार चलता है, अर्थात वह वही करता है जो उसका मन कहता है।
- मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ।
मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ,
जग भव-सागर तरने की नाव बनाए,
मैं भव-मौजों पर मस्त बहा करता हूँ।
शब्दार्थ- उदगार-दिल के भाव। उपहार-भेंट। भाता-अच्छा लगता। स्वप्नों का संसार-कल्पनाओं की दुनिया। दहा-जला। भव-सागर-संसार रूपी सागर। मौज-लहरों।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता प्रसिद्ध गीतकार हरिवंशराय बच्चन हैं। इस कविता में कवि जीवन को जीने की शैली बताता है। साथ ही दुनिया से अपने द्वंद्वात्मक संबंधों को उजागर करता है।
व्याख्या- कवि अपने मन की भावनाओं को दुनिया के सामने कहने की कोशिश करता है। उसे खुशी के जो उपहार मिले हैं, उन्हें वह साथ लिए फिरता है। उसे यह संसार अधूरा लगता है। इस कारण यह उसे पसंद नहीं है। वह अपनी कल्पना का संसार लिए फिरता है। उसे प्रेम से भरा संसार अच्छा लगता है। .
वह कहता है कि मैं अपने हृदय में आग जलाकर उसमें जलता हूँ अर्थात मैं प्रेम की जलन को स्वयं ही सहन करता हूँ। प्रेम की दीवानगी में मस्त होकर जीवन के जो सुख-दुख आते हैं, उनमें मस्त रहता हूँ। यह संसार आपदाओं का सागर है। लोग इसे पार करने के लिए कर्म रूपी नाव बनाते हैं, परंतु कवि संसार रूपी सागर की लहरों पर मस्त होकर बहता है। उसे संसार की कोई चिंता नहीं है।
- मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादाँ’ में अवसाद लिए फिरता हुँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं , हाय, किसी की याद लिए फिरता हुँ !
कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादान वहीं हैं, हाथ, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हुँ, सीखा ज्ञान भुलाना !
शब्दार्थ- यौवन-जवानी। उन्माद-पागलपन। अवसाद-उदासी, खेद। यत्न-प्रयास। नादान-नासमझ, अनाड़ी। दाना-चतुर, ज्ञानी। मूढ़-मूर्ख। जग-संसार।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध पदकक्रियबनाई इसाकवता मेंकोजीनकजनेक शैलो बताता है साथहदुनयासे।अनेट्वंद्वान्कसंबंक उजागर करता ह ।
व्याख्या- कवि कहता है कि उसके मन पर जवानी का पागलपन सवार है। वह उसकी मस्ती में घूमता रहता है। इस दीवानेपन के कारण उसे अनेक दुख भी मिले हैं। वह इन दुखों को उठाए हुए घूमता है। कवि को जब किसी प्रिय की याद आ जाती है तो उसे बाहर से हँसा जाती है, परंतु उसका मन रो देता है अर्थात याद आने पर कवि-मन व्याकुल हो जाता है।
कवि कहता है कि इस संसार में लोगों ने जीवन-सत्य को जानने की कोशिश की, परंतु कोई भी सत्य नहीं जान पाया। इस कारण हर व्यक्ति नादानी करता दिखाई देता है। ये मूर्ख (नादान) भी वहीं होते हैं जहाँ समझदार एवं चतुर होते हैं। हर व्यक्ति वैभव, समृद्ध, भोग-सामग्री की तरफ भाग रहा है। हर व्यक्ति अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए भाग रहा है। वे इतना सत्य भी नहीं सीख सके। कवि कहता है कि मैं सीखे हुए ज्ञान को भूलकर नई बातें सीख रहा हूँ अर्थात सांसारिक ज्ञान की बातों को भूलकर मैं अपने मन के कहे अनुसार चलना सीख रहा हूँ।
- मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता,
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
शब्दार्थ- नाता-संबंध। वैभव-समृद्ध। पग-पैर। रोदन-रोना। राग-प्रेम। आग-जोश। भूय-राजा। प्रासाद-महल। निछावर-कुर्बान। खडहर-टूटा हुआ भवन। भाग-हिस्सा।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध गीतकार हरिवंशराय बच्चन हैं। इस कविता में कवि जीवन को जीने की शैली बताता है। साथ ही दुनिया से अपने द्वंद्वात्मक संबंधों को उजागर करता है।
व्याख्या- कवि कहता है कि मुझमें और संसार-दोनों में कोई संबंध नहीं है। संसार के साथ मेरा टकराव चल रहा है। कवि अपनी कल्पना के अनुसार संसार का निर्माण करता है, फिर उसे मिटा देता है। यह संसार इस धरती पर सुख के साधन एकत्रित करता है, परंतु कवि हर कदम पर धरती को ठुकराया करता है। अर्थात वह जिस संसार में रह रहा है, उसी के प्रतिकूल आचार-विचार रखता है।
कवि कहता है कि वह अपने रोदन में भी प्रेम लिए फिरता है। उसकी शीतल वाणी में भी आग समाई हुई है अर्थात उसमें असंतोष झलकता है। उसका जीवन प्रेम में निराशा के कारण खंडहर-सा है, फिर भी उस पर राजाओं के महल न्योछावर होते हैं। ऐसे खंडहर का वह एक हिस्सा लिए घूमता है जिसे महल पर न्योछावर कर सके।
- मैं रोया, इसको तुम कहाते हो गाना,
मैं फूट पडा, तुम कहते, छंद बनाना,
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक क्या दीवान”
मैं बीवानों का वेश लिए फिरता हूँ
मैं मादकता निद्भाशष लिए फिरता ही
जिसकी सुनकर ज़य शम, झुके; लहराए,
मैं मरती का संदेश लिए फिरता हुँ
शब्दार्थ- फूट पड़ा-जोर से रोया। दीवाना-पागल। मादकता-मस्ती। नि:शेष-संपूर्ण।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध गीतकार हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि जीवन को जीने की अपनी शैली बताता है। साथ ही दुनिया से अपने द्वंद्वात्मक संबंधों को उजागर करता है।
व्याख्या- कवि कहता है कि प्रेम की पीड़ा के कारण उसका मन रोता है। अर्थात हृदय की व्यथा शब्द रूप में प्रकट हुई। उसके रोने को संसार गाना मान बैठता है। जब वेदना अधिक हो जाती है तो वह दुख को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करता है। संसार इस प्रक्रिया को छंद बनाना कहती है। कवि प्रश्न करता है कि यह संसार मुझे कवि के रूप में अपनाने के लिए तैयार क्यों है? वह स्वयं को नया दीवाना कहता है जो हर स्थिति में मस्त रहता है।
समाज उसे दीवाना क्यों नहीं स्वीकार करता। वह दीवानों का रूप धारण करके संसार में घूमता रहता है। उसके जीवन में जो मस्ती शेष रह गई है, उसे लिए वह घूमता रहता है। इस मस्ती को सुनकर सारा संसार झूम उठता है। कवि के गीतों की मस्ती सुनकर लोग प्रेम में झुक जाते हैं तथा आनंद से झूमने लगते हैं। मस्ती के संदेश को लेकर कवि संसार में घूमता है जिसे लोग गीत समझने की भूल कर बैठते हैं।
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
एक गीत
- दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं-
यह सोच थक7 दिन का पथी भी जल्दी-जल्दी चलता हैं!
दिन जल्दी-जल्दी ढोलता हैं!
शब्दार्थ- ढलता-समाप्त होता। यथ-रास्ता। मजिल-लक्ष्य। यथ-यात्री।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ से उद्धृत है। ईसा के रविता हरवंशराय बच्न हैं। इसगत में कवने एक जवना की कुंता तथा प्रेमा की व्याकुलता क वर्णना किया है।
व्याख्या- कवि जीवन की व्याख्या करता है। वह कहता है कि शाम होते देखकर यात्री तेजी से चलता है कि कहीं रास्ते में रात न हो जाए। उसकी मंजिल समीप ही होती है इस कारण वह थकान होने के बावजूद भी जल्दी-जल्दी चलता है। लक्ष्य-प्राप्ति के लिए उसे दिन जल्दी ढलता प्रतीत होता है। रात होने पर पथिक को अपनी यात्रा बीच में ही समाप्त करनी पड़ेगी, इसलिए थकित शरीर में भी उसका उल्लसित, तरंगित और आशान्वित मन उसके पैरों की गति कम नहीं होने देता।
- बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे-
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !
शब्दार्थ- प्रत्याशा-आशा। नीड़-घोंसला। पर-पंख। चचलता-अस्थिरता।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ से उद्धृत है। इस गीत के रचयिता हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने एकाकी जीवन की कुंठा तथा प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है।
व्याख्या- कवि प्रकृति के माध्यम से उदाहरण देता है कि चिड़ियाँ भी दिन ढलने पर चंचल हो उठती हैं। वे शीघ्रातिशीघ्र अपने घोंसलों में पहुँचना चाहती हैं। उन्हें ध्यान आता है कि उनके बच्चे भोजन आदि की आशा में घोंसलों से बाहर झाँक रहे होंगे। यह ध्यान आते ही उनके पंखों में तेजी आ जाती है और वे जल्दी-जल्दी अपने घोंसलों में पहुँच जाना चाहती हैं।3.
- मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचला?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विहवलता हैं!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
शब्दार्थ- विकल-व्याकुल। हित-लिए, वास्ते। चंचल-क्रियाशील। शिथिल-ढीला। यद-पैर। उर-हृदय। विह्वलता-बेचैनी, भाव आतुरता।
प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ से उद्धृत है। इस गीत के रचयिता हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने एकाकी जीवन की कुंठा तथा प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है।
व्याख्या- कवि कहता है कि इस संसार में वह अकेला है। इस कारण उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल नहीं होता, उसकी उत्कंठा से प्रतीक्षा नहीं करता, वह भला किसके लिए भागकर घर जाए। कवि के मन में प्रेम-तरंग जगने का कोई कारण नहीं है। कवि के मन में यह प्रश्न आने पर उसके पैर शिथिल हो जाते हैं। उसके हृदय में यह व्याकुलता भर जाती है कि दिन ढलते ही रात हो जाएगी। रात में एकाकीपन और उसकी प्रिया की वियोग-वेदना उसे अशांत कर देगी। इससे उसका हृदय पीड़ा से बेचैन हो उठता है।
Posted by Vikrant Jadon 4 years, 9 months ago (9650607)
- 5 answers
Posted by Vedansh Negi 4 years, 9 months ago (9436393)
- 1 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
Towns that developed as headquarters of principalities and kingdoms. These are fort towns which came up on the ruins of ancient towns. Eg, Delhi, Hyderabad, Jaipur, Lucknow, Agra and Nagpur.
Posted by Palak Goyal 4 years, 9 months ago (10619769)
- 1 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
भोलानाथ जब अपने साथियों के साथ गली में खेल रहा होता तभी भोलानाथ की माँ उसे अचानक ही पकड़ लेती और भोलानाथ के लाख ना-नुकर करने पर भी चुल्लूभर कड़वा तेल सिर पर डालकर सराबोर कर देती। उसकी नाभि और। लिलार पर काजल की बिंदी लगा देती। बालों में चोटी गूंथकर उसमें फूलदार लट्टू बाँधती और रंगीन कुरता-टोपी पहनाकर ‘कन्हैया’ बना देती थी।
Posted by Satpal Bakshi 4 years, 8 months ago (11050618)
- 4 answers
Jyoti Mannat Class 3 4 years, 7 months ago (11206972)
Posted by Lipsita Sagar 4 years, 9 months ago (11048389)
- 2 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
A network is an interconnected collection of autonomous computers that can share and exchange information.
Amit Kumar 4 years, 9 months ago (10878552)
Posted by Prasann Kushwah 4 years, 9 months ago (10558844)
- 1 answers
Posted by Nikita Yadav 4 years, 9 months ago (9940084)
- 2 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
Cash comprises cash in hand and demand deposite whereas treasury bills are part of cash and equivalents, so these are included in opening and closing cash and cash equivalent only. So these types of transaction no to be included in cash flow from different activities like operating investing, financing activities.
Satyam Suman 4 years, 9 months ago (8654427)
Posted by Jaideep Singh 4 years, 9 months ago (9561302)
- 1 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
R-201,
Fort Road,
Chennai.
Dear Balaji, (Cousin)
I am fine and hope the same for you. I am writing this letter to inviting you at my new home come to shower your blessings on me and my family as we celebrate our new house and new life. we all be so glad to have you on (date) 10-10-2010 as we introduce our new house to the loved ones. please don't miss the party because your presence is valuable.
thank-you,
Raja.
Posted by Rajendra Shinde 4 years, 9 months ago (11050542)
- 1 answers
Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
The term ecology denotes the web of physical and biological systems and processes of which humans are one element. Mountains and rivers, plains and oceans, and the flora and fauna that they support are a part of the ecology.
Posted by Mukesh Kumar 4 years, 9 months ago (10053115)
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Posted by X Y 4 years, 9 months ago (11044357)
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Adithya Dev A 4 years, 9 months ago (10643926)
Posted by Lindo Mabura 4 years, 9 months ago (11050417)
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Posted by Tanishq Mittal 4 years, 9 months ago (11032116)
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Sneha Sharma 4 years, 6 months ago (6993699)
Posted by Malesh Lokuri 4 years, 9 months ago (11050257)
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Posted by Mohd Alshad 4 years, 9 months ago (9589740)
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Bajendra Narayan Sahoo 4 years, 8 months ago (8689071)
Posted by Rituraj Singh Tanwar 4 years, 9 months ago (10360582)
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Abhishek Kumar 4 years, 9 months ago (10482811)
Posted by Sahla Kathija 4 years, 9 months ago (11050124)
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Posted by Sahla Kathija 4 years, 9 months ago (11050124)
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Posted by Raj Nandni 4 years, 9 months ago (10788510)
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Sia ? 4 years, 9 months ago (6945213)
हिमालय कई तरीकों से भारत के लिए बहुत उपयोगी हैं। हिमालय उत्तर में हमारे देश के लिए एक मजबूत प्राकृतिक बाधा बनाते हैं। सदियों से, यह देश के लिए एक मजबूत रक्षा दीवार के रूप में खड़ा है। हिमालय के फायदे निम्नानुसार हैं।
हिमालय एक महान जलवायु बाधा है। वे हमारे देश को मध्य एशिया की ठंडी और सूखी हवाओं से बचाते हैं, यह हिंद महासागर की बारिश से भरी मानसून की हवाओं को उत्तरी देशों तक पहुंचने से रोकता है और उत्तरी भारत में भारी बारिश का कारण बनता है। यदि कोई हिमालय नहीं था, तो हमारा देश थार रेगिस्तान की तरह बंजर होता।
भारत की लगभग सभी महान नदियों में हिमालयी श्रेणियों में उनके स्रोत हैं। प्रचुर मात्रा में बारिश और विशाल बर्फ-मैदानों के साथ-साथ बड़े हिमनद भारत की शक्तिशाली नदियों के भोजन के मैदान हैं। गर्मियों में पिघला हुआ बर्फ सूखे मौसम के दौरान भी इन नदियों को पानी प्रदान करता है और ये बारहमासी नदियों हैं।
हिमालयी ढलानों में घने जंगलों हैं। इन जंगलों में कई प्रकार के पेड़ उगते हैं। ये जंगल लकड़ी और लकड़ी के एक स्टोर-हाउस हैं। ये वन कई प्रकार के जंगली जानवरों और पक्षियों को आश्रय प्रदान करते हैं।
उत्तरी भारत के सभी सुंदर पहाड़ी स्टेशन जैसे श्रीनगर, पहलगाम, गुलमर्ग, शिमला, कुल्लू, मनाली, धर्मशाला, देहरादून, नैनीताल हिमालय में स्थित हैं। हजारों आगंतुक इन पहाड़ी स्टेशनों पर आते हैं।
इन पहाड़ों को अपने ऊंचे चोटियों और गहरे घाटियों से पार करना मुश्किल होता है। इसलिए, उन्होंने कई आक्रमणकारियों को आसानी से हमारे देश पर हमला करने से रोका। इस प्रकार, हमारी उत्तरी सीमा के गार्ड के रूप में हिमालय की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।

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Shambhavi Jha 4 years, 9 months ago (10354652)
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