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Ask QuestionPosted by Arushi Patidar 4 years, 11 months ago
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Posted by Meenal Khandelwal 4 years, 11 months ago
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Posted by Mayank Singh 4 years, 11 months ago
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Posted by Ashwin Yadav 4 years, 11 months ago
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Posted by Sanya Kathuria 4 years, 11 months ago
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Posted by Shaili Kumari 4 years, 11 months ago
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Posted by Prashant Verma 4 years, 7 months ago
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Sia ? 4 years, 7 months ago
वैश्वीकरण से भारत के सामने नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही नतीजे आए हैं परन्तु लोगो ने सकारात्मक प्रभाव को कहीं अधिक महसूस किया हैं: इसके अलावा कुशल, शिक्षित और धनी उपभोक्ताओं और उत्पादकों को फायदा हुआ है।
(i) दूसरी तरफ, बढ़ती प्रतिस्पर्धा के परिणामस्वरूप कई छोटे उत्पादकों और श्रमिकों को नुकसान हुआ है। इसलिए उन्होंने वैश्वीकरण के लाभों को साझा नहीं किया है।
(ii) सरकार को वैश्वीकरण को अधिक निष्पक्ष बनाने की कोशिश करनी चाहिए। न्यायसंगत वैश्वीकरण सभी के लिए अवसर प्रदान करेगा और यह सुनिश्चित भी करेगा कि वैश्वीकरण के लाभों में सबकी बेहतर हिस्सेदारी हो।
Posted by Shivi Verma 5 years ago
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Shivani Kumari 5 years ago
Posted by Urmila Prajapat 5 years ago
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Posted by Gujjar Tanwar 5 years ago
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Baiju Bavara 4 years, 11 months ago
Posted by Aniket Sah 5 years ago
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Ravindra Saini 5 years ago
Posted by Aniket Sah 5 years ago
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Vikram Singh 5 years ago
Posted by Kunal Mahato 5 years ago
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Posted by Kunal Mahato 5 years ago
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Posted by Anchal Patel Anchal 5 years ago
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Posted by Anchal Patel Anchal 5 years ago
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Posted by Arushi Patidar 5 years ago
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Yogita Ingle 5 years ago
यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय: उन्नीसवीं सदी के मध्य तक यूरोपीय देशों का रूप वैसा नहीं था जैसा कि आज है। विभिन्न क्षेत्रों पर अलग-अलग वंश के लोग राज करते थे। इन इलाकों में राजतंत्र का शासन हुआ करता था। उस काल में कई ऐसे तकनीकी परिवर्तन हुए जिनके कारण समाज में अभूतपूर्व बदलाव आये। समाज में आये इन परिवर्तनों ने लोगों में राष्ट्रवाद की भावना को जन्म दिया।
नये राष्ट्रों के निर्माण की प्रक्रिया 1789 में शुरु होने वाली फ्रांस की क्रांति के साथ शुरु हो गई थी। लेकिन किसी भी नई विचारधारा की तरह राष्ट्रवाद को भी अपनी जड़ जमाने में लगभ एक सदी लग गया। इस लंबी प्रक्रिया के अंतिम चरण में फ्रांस का एक प्रजातांत्रिक देश के रूप में गठन हुआ। उसके बाद यह सिलसिला यूरोप के कई अन्य देशों में भी चलने लगा। बीसवीं सदी की शुरुआत आते आते विश्व के कई हिस्सों में आधुनिक प्रजातंत्र की स्थापना हुई।
Posted by Nikhil Sidar 5 years ago
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Posted by Arushi Patidar 5 years ago
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Posted by Ʀɨȶɨӄ Ӄʊʍǟʀ 5 years ago
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Posted by Lokesh Sharma 5 years ago
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Posted by Nisha Gupta 5 years ago
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Yogita Ingle 5 years ago
31 दिसंबर 1929 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में प्रस्ताव पारित कर भारत के लिए पूर्ण स्वराज की मांग की गई थी। नेहरू ने कहा था, "हमारा लक्ष्य सिर्फ स्वाधीनता प्राप्त करना है। हमारे लिए स्वाधीनता है, पूर्ण स्वतंत्रता।" इसी दिन, रावी (भारत-पाकिस्तान) नदी के तट पर भारतीय स्वाधीनता का तिरंगा झंडा फहराया गया था।
Posted by Aditya Pandey Pandey 5 years ago
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Yogita Ingle 5 years ago
साक्षरता दर:- 7 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में साक्षर जनसंख्या का अनुपात को साक्षरता दर कहते हैं ।
Posted by Sunita Devi 5 years ago
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Posted by Mukund Jha 5 years ago
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Gaurav Seth 5 years ago
बेल्जियम ने अपनी विविध जनसंख्या को एक ऐसी व्यवस्था के रूप में समायोजित किया जो विभिन्न समुदायों की आवश्यकताओं के अनुकूल थी। यह निम्नलिखित तरीकों से किया गया था:
- हालांकि डच देश में बहुमत में थे, केंद्र सरकार में फ्रेंच और डच बोलने वाली आबादी को समान प्रतिनिधित्व दिया गया था।
- बेल्जियम को एक संघीय राज्य के रूप में घोषित किया गया था, और इस प्रकार राज्य सरकारों को महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए थे। राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार के अधीनस्थ कार्य नहीं किया।
- राजधानी ब्रुसेल्स की एक अलग सरकार थी। हालाँकि, शहर में फ्रांसीसी बोलने वाली आबादी बहुमत में थी, लेकिन उन्होंने ब्रुसेल्स में समान प्रतिनिधित्व को स्वीकार किया। ऐसा इसलिए था क्योंकि डच भाषी लोगों ने बहुमत में होने के बावजूद केंद्र सरकार में समान प्रतिनिधित्व को स्वीकार किया था।
- सामुदायिक सरकार भी बेल्जियम में मौजूद थी जिसे प्रमुख भाषाई समूहों अर्थात् डच, फ्रेंच और जर्मन भाषी लोगों द्वारा चुना गया था। इस सरकार ने शैक्षिक, भाषा और शैक्षिक मुद्दों की देखभाल की
Posted by Poonam Verma 5 years ago
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Yogita Ingle 5 years ago
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं या क्षेत्रों के आर-पार पूंजी, माल और सेवाओं का आदान-प्रदान है।[1]. अधिकांश देशों में, यह सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के महत्त्वपूर्ण अंश का प्रतिनिधित्व करता है। जबकि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, इतिहास के अधिकांश भाग में मौजूद रहा है (देखें सिल्क रोड, एम्बर रोड) इसका आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक महत्व हाल की सदियों में बढ़ने लगा है।

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Neeraj Bihan 4 years, 11 months ago
2Thank You