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Ask QuestionPosted by Ruchi Lakhera 8 years, 7 months ago
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Posted by Darvesh Drall 8 years, 7 months ago
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Posted by Bittu Kumar 8 years, 7 months ago
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Posted by Yogesh Kanwaria 8 years, 7 months ago
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Posted by Roli Gupta 8 years, 7 months ago
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Posted by Sunder Kumar 8 years, 7 months ago
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Posted by Fardeen Khan 8 years, 7 months ago
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Posted by Sunder Kumar 8 years, 7 months ago
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Posted by Gulbahisht Khan 8 years, 7 months ago
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Posted by Mansi Chaurasia 8 years, 7 months ago
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Posted by Md Afzal 8 years, 7 months ago
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Posted by Devinder Singh 8 years, 7 months ago
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Posted by Gaurav Mukaria 8 years, 7 months ago
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Posted by Kittu Tendwal 8 years, 7 months ago
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Posted by Kittu Tendwal 8 years, 7 months ago
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Posted by Mohit Kumar 8 years, 7 months ago
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Posted by Mohit Kumar 8 years, 7 months ago
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Posted by Suraj Sharma 8 years, 7 months ago
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Posted by Nidhi Rana 8 years, 7 months ago
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Posted by Pooja Pandey 8 years, 7 months ago
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Posted by Kajal Verma 8 years, 7 months ago
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Naveen Sharma 8 years, 7 months ago
हड़प्पा धर्म के स्वरूपों के विषय में प्राप्त जानकारी के अनुसार उसकी प्रमुख विशेषताएं निम्न ज्ञात होती हैं-
- इस सभ्यता में प्रकृति से चलकर देवत्व तक की यात्रा धर्म ने तय की थी। एक ओर हम वृक्ष पूजा देखते हैं तो दूसरी ओर पशुपति शिव की मूर्ति तथा व्यापक देवी पूजा।
- यहाँ देवता और दानव दोनों ही उपास्य थे। देव मूर्तियों के अतिरिक्त अनेक दानवीयस्वरूपों का यहाँ के ठीकड़ों या मुहरों पर आरेखन इस बात का परिचायक है। वृक्ष से लड़ता शेर दानवीय भावना का उदगार ही तो कहा जा सकता है।
- धर्म में आध्यात्म और कर्मकाण्ड दोनों ही यहां साथ उभरे हैं। यहाँ से प्राप्त धड़ विहीन ध्यानावसित संन्यासी की आकृति एक ओर आध्यात्मिक चेतना को उजागर करती है तो दूसरी ओर देवी के सम्मुख पशुबलि के लिए बँधे बकरे की आकृति जो ठिकड़े पर अंकित है कर्मकाण्ड की गहनतम भावना का घोतक है।
- उपासना इसका एक व्यापक अंग रहा है। नृत्य संगीत आदि के बीच देवी की पूजा को प्रदर्शित करने वाला ठिकड़ा भी यही व्यक्त करता है। 5. कुछ ऐसे धर्मों की जानकारी यहाँ के ठिकड़ो से मिलती हैं जिसकी सूचना इस सभ्यता के पतन के लगभग एक हजार वर्ष बाद हमें लिखित साहित्य प्रदान करते हैं जैसे मातृ देवियों की उपासना।
- प्रतीकों को धर्म में स्थान प्राप्त हो चुका था। सूर्य की तरह गोल रेखा वाली उभरती आकृति, स्वस्तिक आदि इस तथ्य के पोषक हैं कि भले ही विष्णु की मूर्ति यहाँ नहीं मिली पर वैष्णव धर्म के प्रतीक यहाँ विद्यमान थे।
- धार्मिक मान्यता और विश्वासों का यह युग था। यहाँ शिवलिंग के नीचे गड़े ताबीजों की तरह के पत्थर के टुकड़े मिले हैं। जिसके एक किनारे पर छिद्र बने हैं। सम्भवतः शिव के द्वारा अभिमंत्रित करने के लिए ही ये लिंग के के नीचे गाडे़ गये होंगे। अन्य कुछ ठिक़डो में मानव देवताओं के साथ नृत्य संगीत तथा धार्मिक उत्सवों को मना रहे हैं।
- मंत्र-तंत्र में भी इनका विश्वास रहा होगा। मुहरों पर बने चिन्हों के ऊपर कुछ अपठनीय लिपि में लिखा है। इसे कोई चित्रांकित लिपि कहता है, कोई मात्र रेखा समूह मानता है। पर ये मंत्र रहे होगें। कुछ मुहरों पर तो विचित्र रेखाएं बनाई गई हैं मानो आज के जंत्र-तंत्र हो।
- लोक-धर्म का भी यहां चलन था। कुछ मुहरों पर घेरों के भीतर वृक्ष में कुछ में फण निकाले नाग की आकृति आदि लोकजीवन की धार्मिक भावना को व्यक्त करते हैं।
Posted by Rani Khatoon 8 years, 7 months ago
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Posted by Allot Lalit Rajput Ji 8 years, 7 months ago
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Posted by Mohd Shahbaz 8 years, 7 months ago
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Posted by Rahul Sharma 8 years, 7 months ago
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