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CBSE - Class 09 - सामाजिक विज्ञान

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फ्रांस की क्रांति सन् 14 जुलाई 1789 ई० को बास्तील की घटना से शुरू हुआ। फ्रांस का एक वर्ग पादरियों, सामन्तों और उच्च पदों के अधिकारियों जो वैभव एवं विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करते थे, वहीं साधारण वर्ग की दशा बदहाल थी। राजा की निरंकुशता, दुर्व्यवस्था एवं कुशासन से फ्रांस की साधारण जनता ऊब चुकी थी। जिसके परिणाम स्वरूप 1789 ई० को फ्रांस में भीषण जन-विद्रोह हुआ और फ्रांस के तत्कालीन राजा 'लुई सोलहवाँ' एवं रानी 'मेरी अन्तोआंत' के मौत के घाट उतार दिए। यह क्रांति 18 जून 1815 ई० को वाटर लू के युद्ध के साथ समाप्त हुआ। इस क्रांति के फलस्वरूप यहाँ के निरंकुश राजतन्त्र का अंत हुआ और फ्रांस में लोकतन्त्र की स्थापना हुई।

इस अध्याय में हम उन्नीसवीं शताब्दी की कुछ महत्त्वपूर्ण राजनीतिक परंपराओं का अध्ययन करेंगे और देखेंगे कि उन्होंने परिवर्तन के संदर्भ में क्या असर डाला। इसके बाद हम एक ऐसी ऐतिहासिक घटना पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे जिसमें समाज के रैडिकल पुनर्गठन का एक गंभीर प्रयास किया गया। रूस में हुई क्रांति के फलस्वरूप समाजवाद बीसवीं सदी का स्वरूप तय करने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली विचारों की शृंखला का हिस्सा बन गया।

1889 में ऑस्टिंया में जन्मे हिटलर की युवावस्था बेहद गरीबी में गुजरी थी। रोजी-रोटी का कोई जरिया न होने के कारण पहले विश्व युद्ध की शुरुआत में उसने भी अपना नाम फ़ौजी भर्ती के लिए लिखवा दिया था। भर्ती के बाद उसने अग्रिम मोर्चे पर संदेशवाहक का काम किया, कॉर्पोरल बना और बहादुरी के लिए उसने कुछ तमगे भी हासिल किए। जर्मन सेना की पराजय ने तो उसे हिला दिया था, लेकिन वर्साय की संधि ने तो उसे आग-बबूला ही कर दिया। 1919 में उसने जर्मन वर्कर्स पार्टी नामक एक छोटे-से समूह की सदस्यता ले ली। धीरे-धीरे उसने इस संगठन पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया और उसे नैशनल सोशलिस्ट पार्टी का नया नाम दिया। इसी पार्टी को बाद में नात्सी पार्टी के नाम से जाना गया।

अस्सी के दशक से एशिया और अफ़्रीका की सरकारों को यह समझ में आने लगा कि वैज्ञानिक वानिकी और वन समुदायों को जंगलों से बाहर रखने की नीतियों के चलते बार-बार टकराव पैदा होते हैं। परिणामस्वरूप, वनों से इमारती लकड़ी हासिल करने के बजाय जंगलों का संरक्षण ज्यादा महत्त्वपूर्ण लक्ष्य बन गया है। सरकार ने यह भी मान लिया है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वन प्रदेशों में रहने वालों की मदद लेनी होगी। मिजोरम से लेकर केरल तक हिंदुस्तान में हर कहीं घने जंगल सिर्फ इसलिए बच पाए कि ग्रामीणों ने सरना, देवराकुडु, कान, राई इत्यादि नामों से पवित्र बगीचा समझ कर इनकी रक्षा की। कुछ गाँव तो वन-रक्षकों पर निर्भर रहने के बजाय अपने जंगलों की चौकसी आप करते रहे हैं - इसमें हर परिवार बारी-बारी से अपना योगदान देता है। स्थानीय वन-समुदाय और पर्यावरणविद् अब वन-प्रबंधन के वैकल्पिक तरीकों के बारे में सोचने लगे हैं।

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इस अध्याय में आप घुमंतू चरवाहों के बारे में पढ़ेंगे। घुमंतू ऐसे लोग होते हैं जो किसी एक जगह टिक कर नहीं रहते बल्कि रोजी-रोटी के जुगाड़ में यहाँ से वहाँ घूमते रहते हैं। देश के कई हिस्सों में हम घुमंतू चरवाहों को अपने जानवरों के साथ आते-जाते देख सकते हैं। चरवाहों की किसी टोली के पास भेड़-बकरियों का रेवड़ या झुंड होता है तो किसी के पास ऊँट या अन्य मवेशी रहते हैं। क्या उन्हें देख कर आपने कभी इस बारे में सोचा है कि वे कहाँ से आए हैं और कहाँ जा रहे हैं? क्या आपको पता है कि कैसे रहते हैं, उनकी आमदनी के साधन क्या हैं और उनका अतीत क्या था?

भारत विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है और इसका इतिहास अद्भुत् रहा है| स्वतंत्रता के पश्चात् भारत ने सामाजिक-आर्थिक रूप से बहुमुखी उन्नति की है। कृषि, उद्योग, तकनिकी और सर्वांगीण आर्थिक विकास में अद्भुत् प्रगति हुई है। भारत के भू-भाग का कुल क्षेत्रफल लगभग 32.8 लाख वर्ग कि.मी. है जो विश्व के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 2.4 प्रतिशत है।

परिचय, मुख्य भौगोलिक वितरण, हिमालय पर्वत-श्रृंखला, उत्तरी मैदान, प्रायद्वीप पठार, भारतीय मरूस्थल, तटीय मैदान, द्वीप समूह, भारत विभिन्न स्थलाकृतियों वाला एक विशाल देश है जहाँ हर प्रकार की भू-आकृतियाँ पाई जाती हैं जैसे- पर्वत, मैदान, मरूस्थल, पठार तथा द्वीप समूह। विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ कैसे बनीं? इन भौतिक आकृतियों के निर्माण के पीछे कुछ सिद्धांत हैं जिनमें से एक सिद्धांत है- प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत। विवर्तनिक सिद्धांत क्या है? इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी की ऊपरी पर्पटी सात बड़ी एवं कुछ प्लेटों से बनी है।

अपवाह या धरातलीय अपवाह (अंग्रेज़ी: Surface runoff) जल की वह मात्रा है जो पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में ढाल का अनुसरण करते हुए जलधाराओं, सरिताओं, नालों और नदियों के रूप में प्रवाहित होता है। अपवाह तंत्र व अपवाह प्रतिरूप दीर्घकाल तक चलने वाली एक क्रमिक प्रक्रिया है | जिसके फलस्वरूप नदियों का वर्गीकरण किया है |

भारत में मानसूनी जलवायु पायी जाती है, क्योंकि यह मानसून पवनों के प्रभाव क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। फिर भी भारतीय जलवायु को दो प्रमुख तत्त्वों में सर्वाधिक प्रभावित किया है:-उत्तर में हिमालय पर्वत की उपस्थिति, जिसके कारण मध्य एशिया से आने वाली शीतल हवाएँ भारत में नहीं आ पाती तथा भारतीय जलवायु महाद्रीपीय जलवायु का स्वरूप प्राप्त करती हैं। दक्षिण में हिन्द महासागर की उपस्थिति एवं भूमध्य रेखा से समीपता, जिसके कारण, कटिबन्धीय जलवायु अपने आदर्श स्वरूप पायी जाती है, जिसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं: दैनिक तापांतर की न्यूनता, अत्यधिक आर्द्रता वाली वायु तथा सम्पूर्ण देश में न्यूनाधिक रूप में वर्षा का होना।

भारत विश्व के मुख्य 12 जैव विविधता वाले देशों में से एक है| लगभग 47,000 विभिन्न जातियों के पौधे पाए जाने के कारण यह देश विश्व में दसवें स्थान पर और एशिया के देशों में चौथे स्थान पर है। भारत में लगभग 15,000 फूलों के पौधे हैं जो कि विश्व में फूलों के पौधों का 6 प्रतिशत है। भारत में लगभग 89,000 जातियों के जानवर तथा विभिन्न प्रकार की मछलियाँ, ताजे तथा समुद्री पानी की पाई जाती हैं।

भारत उनतीस राज्यों और सात केन्द्र शासित प्रदेशों का एक संघ है। सन् 2009 में, लगभग 1.15 अरब की जनसंख्या के साथ भारत विश्व का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। भारत के पास विश्व की कुल भूक्षेत्र का 2.4% भाग है, लेकिन यह विश्व की 17% जनसंख्या का निवास स्थान है। गंगा के मैदानी क्षेत्र विश्व के सबसे विशाल उपजाऊ फैलावों में से एक हैं और यह विश्व के सबसे सघन बसे क्षेत्रों में से एक है। दक्कन के पठार के पूर्वी और पश्चिमी तटीय क्षेत्र भी विश्व के सबसे सघन क्षेत्रों में हैं। पश्चिमी राजस्थान में स्थित थार मरुस्थल विश्व के सबसे सघन मरुस्थलों में से एक है। उत्तर और उत्तर-पूर्व में हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं में बसे राज्यों में ठंडे शुष्क मरुस्थल और उपजाऊ घाटियां हैं।

पालमपुर में खेती मुख्य क्रिया है, जबकि अन्य कई क्रियाएँ जैसे, लघु-स्तरीय विनिर्माण, डेयरी, परिवहन आदि सीमित स्तर पर की जाती हैं। इन उत्पादन क्रियाओं के लिए विभिन्न प्रकार के संसाधनों की आवश्यकता होती है, यथा-प्राकृतिक संसाधन, मानव निर्मित वस्तुएँ, मानव प्रयास, मुद्रा आदि। पालमपुर की कहानी से हमें विदित होगा कि गाँव में इच्छित वस्तुओं और सेवाओं को उत्पादित करने के लिए विभिन्न संसाधन किस प्रकार समायोजित होते हैं।

‘संसाधन के रूप में लोग’ अध्याय जनसंख्या की, अर्थव्यवस्था पर दायित्व से अधिक परिसंपत्ति के रूप में, व्याख्या करने का प्रयास है। जब शिक्षा, प्रशिक्षण और चिकित्सा सेवाओं में निवेश किया जाता है तो वही जनसंख्या मानव पूँजी में बदल जाती है। वास्तव में, मानव पूँजी कौशल और उनमें निहित उत्पादन के ज्ञान का स्टॉक है।

निर्धनता या गरीबी एक अवस्था है जिसमें जीवन जीने के लिए न्युनतम उपयोग रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मानवीय आवश्यकताओं को प्राप्त करने में असमर्थता या आभाव को निर्धनता कहते हैं । इस अध्याय में निर्धनता के विषय में चर्चा की गई है, जो स्वतंत्र भारत के सम्मुख एक सर्वाधिक कठिन चुनौती है। उदाहरणों द्वारा इस बहुआयामी समस्या की चर्चा करने के पश्चात् यह अध्याय सामाजिक विज्ञानों में निर्धनता के प्रति दृष्टिकोण की भी चर्चा करता है। भारत तथा विश्व में निर्धनता की प्रवृत्तियों को निर्धनता रेखा की अवधारणा के माध्यम से समझाया गया है। निर्धनता के कारणों एवं सरकार द्वारा किए गए निर्धनता निवारण के उपायों की भी चर्चा की गई है। निर्धनता की आधिकारिक अवधारणा को मानव निर्धनता तक विस्तृत करके अध्याय का समापन किया गया है।

भारत में हमेशा खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर गंभीरता दिखाई गई और यही वजह है कि वर्ष 1960 में श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में हरितक्रांति की शुरुआत हुई। जिस अनुपात से जनसंख्या बढ़ी उसके हिसाब से हमने अन्न भी उपजाया लेकिन भुखमरी खत्म नहीं हुई। हरित क्रांति के बाद सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अन्त्योदय अन्न योजना, अन्नपूर्णा योजना, डीजल सब्सिडी योजना आदि योजनाएं लागू की। इसके अलावा ‘काम के बदले अनाज’ योजना के माध्यम से गरीबों को राहत देने का प्रयास किया गया फिर भी उम्मीदों के अनुरूप सुधार नहीं हुआ क्योंकि इसका मुख्य कारण यह था कि इन योजनाओं में कुछ कमियां विद्यमान थी जिससे सरकार अवगत नहीं थी। परिणामस्वरूप खाद्यान्न घोटाले की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए सरकार को खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की जरूरत महसूस हुई।

एक लोकतान्त्रिक सरकार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है | ऐसी सरकारें जनता द्वारा निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव द्वारा चुनी हुई होती है | लोकतांत्रिक सरकार जनता और संविधान के प्रति जबाबदेह होती है | लोगों द्वारा चुने गए सदस्य ही देश के शासन की बागडोर संभालते हैं और वे सारे प्रमुख फैसले संविधान के अनुरूप ही लेते है | एक सरल परिभाषा: लोकतंत्र शासन का एक ऐसा रूप है जिसमें शासकों का चुनाव लोग करते हैं।

संविधान निर्माण की सर्वप्रथम मांग बाल गंगाधर तिलक द्वारा 1895 में "स्वराज विधेयक" द्वारा की गई। 1916 में होमरूल लीग आन्दोलन चलाया गया।जिसमें घरेलू शासन सचांलन की मांग अग्रेजो से की गई। 1922 में गांधी जी ने संविधान सभा और संविधान निर्माण की मांग प्रबलतम तरीके से की और कहा- कि जब भी भारत को स्वाधीनता मिलेगी भारतीय संविधान का निर्माण -भारतीय लोगों की इच्छाओं के अनुकुल किया जाएगा।

चुनाव लोकतंत्र का आधार स्तम्भ हैं। आजादी के बाद से भारत में चुनावों ने एक लंबा रास्ता तय किया है। 1951-52 को हुए आम चुनावों में मतदाताओं की संख्या 17,32,12,343 थी, जो 2014 में बढ़कर 81,45,91,184 हो गई है।2004 में, भारतीय चुनावों में 670 मिलियन मतदाताओं ने भाग लिया (यह संख्या दूसरे सबसे बड़े यूरोपीय संसदीय चुनावों के दोगुने से अधिक थी) और इसका घोषित खर्च 1989 के मुकाबले तीन गुना बढ़कर $300 मिलियन हो गया। इन चुनावों में दस लाख से अधिक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल किया गया।

देश के विभिन्न स्तरों पर मौजूद अदालतो को सामूहिक रूप से न्यायपालिका कहते है सर्वोच्य न्यायालय देश में न्यायिक प्रशासन को नियंत्रित करती है भारत की न्यायपालिका दुनिया की सर्वाधिक प्रभावशाली न्यायपालिकाओं में से एक न्यायपालिका है लोकतांत्रिक देश में कानून बनाने का सबसे बड़ा अधिकार संसद के पास होता है भारत में निर्वाचित प्रतिनिधियों की राष्ट्रिय सभा को संसद कहते है राज्य स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों की सभा को विधान सभा कहते हैं कानून बनाने अथवा विधि निर्माण के लिए निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की सभा को विधायिका कहते हैं

हमारा सविधान छः मौलिक अधिकार प्रदान करता है :- (1) समानता का अधिकार | (2) स्वतंत्रता का अधिकार | (3) शोषण के विरुद्ध अधिकार | (4) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार | (5) सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार | (6) संवैधानिक उपचार का अधिकार | समानता का मतलब है हर किसी से उसकी जरूरी का ख्याल रखते हुए सामान व्यवहार करना | समानता का मतलब है हर आदमी को उसकी क्षमता के अनुसार काम करने का समान अवसर उपलब्ध हो |



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